Wednesday, July 21, 2010
पर्यावरण का अहम हिस्सा रहे गिध्द अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के कगार पर हैं, पर बात गिध्दों तक ही खत्म होती नजर नहीं आती। कौवों की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है। ठीक इसी प्रकार हमने अपनी दुनिया बसाते हुए चिड़ियों के घर उजाड़ दिए और उनके नए बसेरे का कोई इंतजाम भी नहीं किया। ............................................... आखिर क्यों ?
Sunday, July 11, 2010
बदहाल बुंदेलखंड
बुंदेलखंड में बेतहाशा गर्मी की वजह से न सिर्फ पीने के पानी की किल्लत हो गई है। बल्कि नदियां सूखने की वजह से बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ा है। तपिस और झुलसा देने वाली गर्मी ने बुंदेलखंड के कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा कर डाले हैं। हैरत इस बात को लेकर है कि राज्य सरकार गर्मी से उत्पन्न संकट को दूर करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनायें तो बना रही है, लेकिन धरातल में कारगर न हो पाने से लोगों की दिक्कत बढ़ी है।
आम तौर पर पथरीले बुंदेलखंड में गर्मी के मौसम में धरती जलती है लेकिन इस साल तो तापमान ने सारे रिकार्ड तोड़ डाले पारा ५० डिग्री के पार तक पहुंचा और गर्मी ने लोगों को बेहाल कर डाला। बुंदेलखंड में इस साल अप्रैल से ही आसमान ने जहां आग बरसाई वहीं धरती भी तवे की तरह लाल रही। इस साल अभी भी बुंदेलखंड वासियों को अच्छे मानसून का इंतजार है। अगर इस वर्ष भी वर्षा अच्छी न हुई तो बुंदेलखंड लगातार पांचवे वर्ष भी सूखा ही झेलेगा। लोगों का पलायन होगा औ भूख से मौते होंगी। पिछले मौसमों में लगातार कम बारिश के चलते जमीन के नीचे के जल स्तर में भारी गिरावट आई, नदियों का भी प्रवाह थम सा गया। गर्मी ने इस संकट को और बढ़ाया और हालात भयावहता की ओर है। शहर ही नहीं बुंदेलखंड के सैंकड़ों गांव पानी के संकट से जूझ रहे हैं। पानी के इस संकट के लिए विशेषज्ञ सरकार की नीतियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। बुंदेलखंड में जिस तरीके से नदियों का दोहन किया गया और पारंपरिक जल स्रोतों पर तवज्जों नहीं दी गयी। उसकी वजह से बुंदेलखंड में जल संकट पैदा हो गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो या नदी और पहाड़ों का खनन की वजह से पर्यावरण संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा रहा है। नतीजा यह कि सूरज की तपिश की वजह से आम जनता का जीना हराम हो गया है गर्मी के हालातों को देखते हुए ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ ध्यान नहीं देती पिछली बार पानी की समस्या से निपटने के लिए साढ़े सात सौ करोड़ बुंदेलखंड को मिले थे। ये रुपया कहां गया किसी को पता नहीं है। इस बार बुंदेलखंड को १२ सौ करोड़ का झुनझुना मिला है लेकिन अगर काम के नाम पर कुछ हो रहा है तो वह सियासत है। समूचे बुंदेलखंड हलक से लेकर खेत तक प्यासा है। जानवरों के चारे का संकट है। तभी तो भूगर्भ जल निदेशालय ने शहर वासियों को पानी से होने वाली परेशानी से चेताया है। रिपोर्ट के अनुसार जल दोहन से बांदा से प्रतिवर्ष भूगर्भ जलस्तर ६५ सेंटीमीटर गिर रहा है जबकि झांसी में ५० सेंटीमीटर गिर रहा है। लखनऊ ५६ तो कानपुर ४५ है।
बुंदेलखंड विन्ध्य पठारी क्षेत्र में स्थित बांदा दक्षिणी पुनिनसुलर क्षेत्र में सेंडीमेंटस शैल समूह के अंतर्गत आता है। प्रदेश में सबसे गहराई वाला जल स्तर क्षेत्र बेतवा और यमुना की घटियों में पाया जाता है। इसमें बांदा चित्रकूट, हमीरपुर जालौन, झांसी सहित इलाहाबाद हैं। बुंदेलखंड में पानी की समस्या नई नहीं है। यहां भूगर्भ है। जल सीमित है क्योंकि धरती के नीचे की बनावट ही ऐसी है कि बहुत बड़ा जल का स्टोर नहीं हो सकता है। स्थिति तब भयावह हो जाती है जब हम लगातार भू गर्भ जल का दोहन करते आ रहे हैें और उसके रिचार्ज की उचित व्यवस्था हमारे पास नहीं है। साथ ही कम होती वर्ष बड़ा संकट है। केन नदी जनवरी में ही सूखने की स्थिति में आ जाती है। गर्मी के पांच महीने जुलाई तक पानी का घोर संकट रहता है। पारंपरिक जलस्रोत सूख जाते हैं। पिछले छह सालों से कम वर्षा बांदा में सूखे काल का प्रमुख कारण है। २००३ से २००९ तक कुल ३७२ दिन बारिश हुई। निरंतर गहराता जलसंकट जन जागरूकता, सामूहिक प्रयासों के अभाव के कारण पैदा हुआ है।
बुंदेलखंड में ज्यादातर क्षेत्र असिंचित होने के कारण बिना बुवाई के रह जाता है। सैंकड़ों लोग प्रदूषित पानी से उपजी बीमारियों के कारण मौत की नींद सो जाते हैं। कुछ क्षेत्र में हाथ, पैर में लकवा, आंखों की अंधता, पथरी, बवासीर, रक्त की कमी, टीवी आदि से ग्रसित रहते हैं। केन नदी को वीभत्स बनाने वाला चाहे करिया नाला हो या मंदाकिनी को प्रदूषित करने वाला सीवर देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदी में कितनी तादाद में जहर प्रतिदिन घुल रहा है। बहरहाल रसूखदार मंत्रियों के ग्रह जनपद से लेकर पूरे बुंदेलखंड में एक दर्जन लाल बत्तियां भले ही अपनी प्यास बुझा रही हों लेकिन गिरते जल स्तर ने बुंदेलखंडवासियों के हलक सूखा दिये हैं। बुंदेलखंड में सरकारी खजाने से जारी हुयी करोड़ों रुपये का इस्तेमाल जलसंचयन, जल प्रबंधन नहरों, तालाबों और कुओं की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाना था। साथ ही इन सभी स्रातों में बरसात का पानी एकत्र करने की योजना थी मगर न तो पानी एकत्र किया गया। न ही नहरों की तालाबों की सफाई हो सकी। आखिर सरकार का रुपया कौन डकार गया केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के वैज्ञानिक डा. डीएस पाण्डेय साफ कहते हैं कि चित्रकूटधाम मंडल के बांदा जनपद के आठ विकास खंड के चार हमीरपुर के सात में चार महोबा के पांच में तीन व चित्रकूट के पांचों विकास खंडों में जल स्तर एक से तीन मीटर नीचे खिसक गया है। केन बेतवा गठजोड़ से पहले अब भू गर्भ जल स्तर को बचाने की आवश्यकता है।
बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पोखर तालाब और सरोवर जीवन पालक हैं जहां पशुपक्षी ही नहीं आदमी भी अपनी प्यास बुझाता है। बीते दो दशक में अतिक्रमण के चलते तालाबों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप में कमी आई है। पटेल की माने तो डेढ़ करोड़ हजार तालाबों में करीब पांच सौ ही तालाबों में पानी है। सूरज की भीषण तपन से जहां जीव जन्तु बेहाल हैं वहीं जानवर प्यास बुझाने को जंगलों में भटक रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में कुल १५५३ तालाब हैं। जिसमें एक हजार सूख चुके हैं। बानगंगा नदी, कडैली नाला एवं बदरहा नाला के सूखने से पहाड़ों की तलहटों में बसे कुरुह, बरकठा, जरैला, राजाडाडी, खेरियां, महुई, कुलसारी एवं छतैनी गांवों में पेयजल संकट बढ़ा है।
आम तौर पर पथरीले बुंदेलखंड में गर्मी के मौसम में धरती जलती है लेकिन इस साल तो तापमान ने सारे रिकार्ड तोड़ डाले पारा ५० डिग्री के पार तक पहुंचा और गर्मी ने लोगों को बेहाल कर डाला। बुंदेलखंड में इस साल अप्रैल से ही आसमान ने जहां आग बरसाई वहीं धरती भी तवे की तरह लाल रही। इस साल अभी भी बुंदेलखंड वासियों को अच्छे मानसून का इंतजार है। अगर इस वर्ष भी वर्षा अच्छी न हुई तो बुंदेलखंड लगातार पांचवे वर्ष भी सूखा ही झेलेगा। लोगों का पलायन होगा औ भूख से मौते होंगी। पिछले मौसमों में लगातार कम बारिश के चलते जमीन के नीचे के जल स्तर में भारी गिरावट आई, नदियों का भी प्रवाह थम सा गया। गर्मी ने इस संकट को और बढ़ाया और हालात भयावहता की ओर है। शहर ही नहीं बुंदेलखंड के सैंकड़ों गांव पानी के संकट से जूझ रहे हैं। पानी के इस संकट के लिए विशेषज्ञ सरकार की नीतियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। बुंदेलखंड में जिस तरीके से नदियों का दोहन किया गया और पारंपरिक जल स्रोतों पर तवज्जों नहीं दी गयी। उसकी वजह से बुंदेलखंड में जल संकट पैदा हो गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो या नदी और पहाड़ों का खनन की वजह से पर्यावरण संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा रहा है। नतीजा यह कि सूरज की तपिश की वजह से आम जनता का जीना हराम हो गया है गर्मी के हालातों को देखते हुए ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ ध्यान नहीं देती पिछली बार पानी की समस्या से निपटने के लिए साढ़े सात सौ करोड़ बुंदेलखंड को मिले थे। ये रुपया कहां गया किसी को पता नहीं है। इस बार बुंदेलखंड को १२ सौ करोड़ का झुनझुना मिला है लेकिन अगर काम के नाम पर कुछ हो रहा है तो वह सियासत है। समूचे बुंदेलखंड हलक से लेकर खेत तक प्यासा है। जानवरों के चारे का संकट है। तभी तो भूगर्भ जल निदेशालय ने शहर वासियों को पानी से होने वाली परेशानी से चेताया है। रिपोर्ट के अनुसार जल दोहन से बांदा से प्रतिवर्ष भूगर्भ जलस्तर ६५ सेंटीमीटर गिर रहा है जबकि झांसी में ५० सेंटीमीटर गिर रहा है। लखनऊ ५६ तो कानपुर ४५ है।
बुंदेलखंड विन्ध्य पठारी क्षेत्र में स्थित बांदा दक्षिणी पुनिनसुलर क्षेत्र में सेंडीमेंटस शैल समूह के अंतर्गत आता है। प्रदेश में सबसे गहराई वाला जल स्तर क्षेत्र बेतवा और यमुना की घटियों में पाया जाता है। इसमें बांदा चित्रकूट, हमीरपुर जालौन, झांसी सहित इलाहाबाद हैं। बुंदेलखंड में पानी की समस्या नई नहीं है। यहां भूगर्भ है। जल सीमित है क्योंकि धरती के नीचे की बनावट ही ऐसी है कि बहुत बड़ा जल का स्टोर नहीं हो सकता है। स्थिति तब भयावह हो जाती है जब हम लगातार भू गर्भ जल का दोहन करते आ रहे हैें और उसके रिचार्ज की उचित व्यवस्था हमारे पास नहीं है। साथ ही कम होती वर्ष बड़ा संकट है। केन नदी जनवरी में ही सूखने की स्थिति में आ जाती है। गर्मी के पांच महीने जुलाई तक पानी का घोर संकट रहता है। पारंपरिक जलस्रोत सूख जाते हैं। पिछले छह सालों से कम वर्षा बांदा में सूखे काल का प्रमुख कारण है। २००३ से २००९ तक कुल ३७२ दिन बारिश हुई। निरंतर गहराता जलसंकट जन जागरूकता, सामूहिक प्रयासों के अभाव के कारण पैदा हुआ है।
बुंदेलखंड में ज्यादातर क्षेत्र असिंचित होने के कारण बिना बुवाई के रह जाता है। सैंकड़ों लोग प्रदूषित पानी से उपजी बीमारियों के कारण मौत की नींद सो जाते हैं। कुछ क्षेत्र में हाथ, पैर में लकवा, आंखों की अंधता, पथरी, बवासीर, रक्त की कमी, टीवी आदि से ग्रसित रहते हैं। केन नदी को वीभत्स बनाने वाला चाहे करिया नाला हो या मंदाकिनी को प्रदूषित करने वाला सीवर देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदी में कितनी तादाद में जहर प्रतिदिन घुल रहा है। बहरहाल रसूखदार मंत्रियों के ग्रह जनपद से लेकर पूरे बुंदेलखंड में एक दर्जन लाल बत्तियां भले ही अपनी प्यास बुझा रही हों लेकिन गिरते जल स्तर ने बुंदेलखंडवासियों के हलक सूखा दिये हैं। बुंदेलखंड में सरकारी खजाने से जारी हुयी करोड़ों रुपये का इस्तेमाल जलसंचयन, जल प्रबंधन नहरों, तालाबों और कुओं की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाना था। साथ ही इन सभी स्रातों में बरसात का पानी एकत्र करने की योजना थी मगर न तो पानी एकत्र किया गया। न ही नहरों की तालाबों की सफाई हो सकी। आखिर सरकार का रुपया कौन डकार गया केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के वैज्ञानिक डा. डीएस पाण्डेय साफ कहते हैं कि चित्रकूटधाम मंडल के बांदा जनपद के आठ विकास खंड के चार हमीरपुर के सात में चार महोबा के पांच में तीन व चित्रकूट के पांचों विकास खंडों में जल स्तर एक से तीन मीटर नीचे खिसक गया है। केन बेतवा गठजोड़ से पहले अब भू गर्भ जल स्तर को बचाने की आवश्यकता है।
बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पोखर तालाब और सरोवर जीवन पालक हैं जहां पशुपक्षी ही नहीं आदमी भी अपनी प्यास बुझाता है। बीते दो दशक में अतिक्रमण के चलते तालाबों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप में कमी आई है। पटेल की माने तो डेढ़ करोड़ हजार तालाबों में करीब पांच सौ ही तालाबों में पानी है। सूरज की भीषण तपन से जहां जीव जन्तु बेहाल हैं वहीं जानवर प्यास बुझाने को जंगलों में भटक रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में कुल १५५३ तालाब हैं। जिसमें एक हजार सूख चुके हैं। बानगंगा नदी, कडैली नाला एवं बदरहा नाला के सूखने से पहाड़ों की तलहटों में बसे कुरुह, बरकठा, जरैला, राजाडाडी, खेरियां, महुई, कुलसारी एवं छतैनी गांवों में पेयजल संकट बढ़ा है।
उत्साह की लहर दौड़ा गयी क्वींस बेटन
राष्ट्रमंडल खेलों की मशाल क्वींस बेटन नवाबों के शहर लखनऊ में आयी तो पूरे शहर में उत्साह की लहर दौड़ गयी। नन्हें-मुन्ने बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक उसे एक झलक देखने और एक बार उसे छू लेने की लालसा लेकर घंटों सड़क पर उस तरफ टकटकी लगाकर देखते रहे जिस रास्ते से क्वींस बेटन आ रही थी। तमाम देशों के झंडों के बीच लहराते तिरंगे और देशभक्ति की भावना से ओत प्रोत नारों के साथ स्कूली बच्चे कड़ी धूप के बावजूद घंटों क्वींस बेटन के इंतजार में सड़कों पर खड़े रहे।
क्वींस बेटन को सीतापुर के रास्ते लखनऊ आना था। लखनऊ में उसका पहला स्वागत इटौंजा में होना था। इसी वजह से इटौंजा और लखनऊ के एतिहासिक आसिफी इमामबाड़े के बाहर लोगों का हुजूम जमा था। अपने निर्धारित समय से डेढ़ घंटा देर से इटौंजा पहुंची क्वींस बेटन के स्वागत के उत्साह में कोई कमी नजर नहीं आयी। इमामबाड़े के बाहर सुबह से ही स्वागत की तैयारियां चल रही थीं। इमामबाड़े के पास उसे शाम पांच बजे पहुंचना था। स्वागत की तैयारियां पूरी थीं। स्कूली बच्चे पसीने से लथपथ थे। इसी बीच खबर आयी कि क्वींस बेटन अब सीतापुर से चली है। उसे पहुंचते-पहुंचते तीन-चार घंटे लग जाएंगे। किसी और का इंतजार होता तो शायद लोगों की वापसी शुरू हो जाती लेकिन क्वींस बेटन का मामला था इसलिए स्कूली बच्चों ने अपने कार्यक्रम का रिहर्सल कर दिया। कुछ ही देर के बाद सड़क पर बढ़ती भीड़ को देखकर मुख्य मार्ग को बंद करना पड़ा। रास्ता बंद हो गया तो उत्साह चरम पर आ गया। स्कूली बच्चों ने अपना कार्यक्रम सड़क पर ही शुरू कर दिया। उधर क्वींस बेटन इटौंजा पहुंच चुकी थी। इटौंजा से लेकर बख्शी का तालाब तक सड़क के दोनों ओर लोगों का हुजूम स्वागत के लिए खड़ा हुआ था। क्वींस बेटन अपने लाव लश्कर के साथ आसिफी इमामबाड़े पहुंची तो लखनऊ के मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, ओलम्पिक संघ के पदाधिकारी सबके सब मुस्तैद थे। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि उन ऐतिहासिक पलों को कैद करने के लिए तैयार थे। इधर बादलों की ओट में सूरज छुपा उधर क्वींस बेटन का कारवां टीले वाली मस्जिद की तरफ से आसिफी इमामबाड़े की ओर मुड़ता नजर आया। क्वींस बेटन को देखते ही देशभक्ति से ओतप्रोत नारे वातावरण में गूंजने लगे। देशभक्ति के गीत लाउडस्पीकर पर सुनायी पड़ने लगे। खुली जीप पर चमचमाती क्वींस बेटन हजारों लोगों के बीच से गुजरती कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गयी। महत्वपूर्ण हस्तियों के हाथों में कुछ देर रहने के बाद क्वींस बेटन कानपुर रोड स्थित सिटी मान्टेसरी स्कूल के लिए रवाना हो गयी। सिटी मान्टेसरी स्कूल में स्कूली बच्चों ने क्वींस बेटन के सम्मान में एक से बढ़कर एक सांस्कृतिक कार्यव्रम प्रस्तुत किए।
अगले दिन क्वींस बेटन एक बार फिर इमामबाड़े के बाहर जा पहुंची। भीड़ इस बार भी खूब थी लेकिन इस बार स्कूली बच्चों से ज्यादा खिलाड़ी नजर आ रहे थे। यह नामवर खिलाड़ी भी स्कूली बच्चों की तरह से क्वींस बेटन को छूने और निहारने को लालायित नजर आ रहे थे। जब क्वींस बेटन जाने-माने खिलाड़ी विजय सिंह चौहान के हाथ में आयी और केडी सिंह बाबू स्टेडियम के लिए रिले दौड़ शुरू हो गयी। एक खिलाड़ी के हाथ से दूसरे खिलाड़ी के हाथों में पहुंचती क्वींस बेटन के डी सिंह बाबू स्टेडियम जा पहुंची। स्टेडियम से उसे उसकी मंजिल की तरफ रवाना कर दिया गया। लखनऊ से रायबरेली होते हुए राष्ट्रमंडल खेलों की यह मशाल देश की राजधानी दिल्ली के लिए कूच कर गयी।
क्वींस बेटन को सीतापुर के रास्ते लखनऊ आना था। लखनऊ में उसका पहला स्वागत इटौंजा में होना था। इसी वजह से इटौंजा और लखनऊ के एतिहासिक आसिफी इमामबाड़े के बाहर लोगों का हुजूम जमा था। अपने निर्धारित समय से डेढ़ घंटा देर से इटौंजा पहुंची क्वींस बेटन के स्वागत के उत्साह में कोई कमी नजर नहीं आयी। इमामबाड़े के बाहर सुबह से ही स्वागत की तैयारियां चल रही थीं। इमामबाड़े के पास उसे शाम पांच बजे पहुंचना था। स्वागत की तैयारियां पूरी थीं। स्कूली बच्चे पसीने से लथपथ थे। इसी बीच खबर आयी कि क्वींस बेटन अब सीतापुर से चली है। उसे पहुंचते-पहुंचते तीन-चार घंटे लग जाएंगे। किसी और का इंतजार होता तो शायद लोगों की वापसी शुरू हो जाती लेकिन क्वींस बेटन का मामला था इसलिए स्कूली बच्चों ने अपने कार्यक्रम का रिहर्सल कर दिया। कुछ ही देर के बाद सड़क पर बढ़ती भीड़ को देखकर मुख्य मार्ग को बंद करना पड़ा। रास्ता बंद हो गया तो उत्साह चरम पर आ गया। स्कूली बच्चों ने अपना कार्यक्रम सड़क पर ही शुरू कर दिया। उधर क्वींस बेटन इटौंजा पहुंच चुकी थी। इटौंजा से लेकर बख्शी का तालाब तक सड़क के दोनों ओर लोगों का हुजूम स्वागत के लिए खड़ा हुआ था। क्वींस बेटन अपने लाव लश्कर के साथ आसिफी इमामबाड़े पहुंची तो लखनऊ के मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, ओलम्पिक संघ के पदाधिकारी सबके सब मुस्तैद थे। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि उन ऐतिहासिक पलों को कैद करने के लिए तैयार थे। इधर बादलों की ओट में सूरज छुपा उधर क्वींस बेटन का कारवां टीले वाली मस्जिद की तरफ से आसिफी इमामबाड़े की ओर मुड़ता नजर आया। क्वींस बेटन को देखते ही देशभक्ति से ओतप्रोत नारे वातावरण में गूंजने लगे। देशभक्ति के गीत लाउडस्पीकर पर सुनायी पड़ने लगे। खुली जीप पर चमचमाती क्वींस बेटन हजारों लोगों के बीच से गुजरती कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गयी। महत्वपूर्ण हस्तियों के हाथों में कुछ देर रहने के बाद क्वींस बेटन कानपुर रोड स्थित सिटी मान्टेसरी स्कूल के लिए रवाना हो गयी। सिटी मान्टेसरी स्कूल में स्कूली बच्चों ने क्वींस बेटन के सम्मान में एक से बढ़कर एक सांस्कृतिक कार्यव्रम प्रस्तुत किए।
अगले दिन क्वींस बेटन एक बार फिर इमामबाड़े के बाहर जा पहुंची। भीड़ इस बार भी खूब थी लेकिन इस बार स्कूली बच्चों से ज्यादा खिलाड़ी नजर आ रहे थे। यह नामवर खिलाड़ी भी स्कूली बच्चों की तरह से क्वींस बेटन को छूने और निहारने को लालायित नजर आ रहे थे। जब क्वींस बेटन जाने-माने खिलाड़ी विजय सिंह चौहान के हाथ में आयी और केडी सिंह बाबू स्टेडियम के लिए रिले दौड़ शुरू हो गयी। एक खिलाड़ी के हाथ से दूसरे खिलाड़ी के हाथों में पहुंचती क्वींस बेटन के डी सिंह बाबू स्टेडियम जा पहुंची। स्टेडियम से उसे उसकी मंजिल की तरफ रवाना कर दिया गया। लखनऊ से रायबरेली होते हुए राष्ट्रमंडल खेलों की यह मशाल देश की राजधानी दिल्ली के लिए कूच कर गयी।
Saturday, July 10, 2010
Tuesday, June 29, 2010
रोचक हुआ राजनीतिक खेल
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के दौरे ने बिहार की राजनीति को एक नया रंग दे दिया है। उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को लागू करने की घोषणा करके मायावती ने बिहार के अन्य राजनीतिक दलों में खलबली मचा दी है। मायावती के दौरे का असर साफ नजर आने लगा है। सभी राजनीतिक दल अपने अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने में जुट गए हैं।
बसपा सुप्रीमों मायावती के दौरे का असर भाजपा -जदयू गठबंधन पर साफ दिखायी देने लगा है। भाजपा-जदयू गठबंधन में आयी दरार का मुख्य कारण बसपा सुप्रीमो मायावती के सफल दौरे को ही माना जा रहा है। मायावती की जनसभा में जुटी भारी भीड़ से अन्य दलों को यह आभास हो गया है कि दलित और मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ सवर्ण मतदाताओं का रुझान भी बसपा की ओर बढ़ा है। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा को भले ही उत्तर प्रदेश की तरह अपेक्षित सफलता न मिले लेकिन बसपाके लिए बिहार का चुनावी गणित काफी सक्षम प्रतीत हो रही है।
हालांकि इससे पूर्व भी बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा को कोई बड़ी सफलता हासिल नहीं हुई थी क्योंकि उन चुनाव में बसपा सिर्फ (वोट कटवा ) के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकी थी। लेकिन बसपा ने धर्मनिरपेक्ष मतों का जातिगत आधार पर बंटवारा करके धर्मनिरपेक्ष दलों को काफी नुकसान पहुंचाया था। बसपा के इसी रूप का लाभ भाजपा-जदयू गठबंधन को मिला था और बिहार में इस गठबंधन ने सत्ता संभाली थी। यह कहना उचित न होगा कि बसपा ही बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार बनाने में मदद की थी। क्योंकि पिछले चुनाव में नीतीश कुमार की लोकप्रियता और जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद की अलोकप्रियता ने इस गठबंधन को सत्ता में पहुंचाया था। आगामी विधान सभा चुनाव में जहां इस गठबंधन को सत्ता में आने की चुनौती है वहीं लालू प्रसाद यादव और पासवान भी कांग्रेस को साथ लेकर सत्ता हासिल करने की चुनौती दे रहे हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में बहुमत हासिल करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने बिहार की सत्ता हासिल करने का सपना संजोया है।
बिहार के सभी राजनीतिक दल बसपा की उपस्थिति से अपनी-अपनी सफलताओं के प्रति चिंतित नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी इस चिंता का असर साफ नजर आने लगा है। यही कारण है कि उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों से अपने को अलग करने का फैसला किया है। आमजनसभा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्धारा दी गयी आपदा धनराशि को वापस करने की घोषणा को नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। नीतीश अपनी इस रणनीति से एक तीर से दो शिकार करना चाह रहे हैं। पहला यह कि नीतीश कुमार मुस्लिम मतदाताओं के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि उनका सांप्रदायिक शक्तियों से कोई लेना देना नहीं। वह मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी हैं। दुसरा यह कि उनकी सरकार ने अपने सहयोगी दल भाजपा के दबाव में कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे कि अल्पसंख्यक हितों की अनदेखी की जाएगी। नीतीश कुमार अपनी इस चाल से एक तरफ कांग्रेस, लालू-पासवान गठबंधन के मुस्लिम मतों में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ बसपा के प्रति बढ़ते रुझान को भी रोकने का प्रयास कर रहे हैं। श्री कुमार अपनी इन राजनीतिक रणनीतियों के साथ-साथ अपने विकास कार्यों को प्रचारित प्रसारित करके अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। फिलहाल बिहार में बसपा की सक्रियता से चुनावी गणित काफी रोचक हो गया है। जहां राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, लोजपा अध्यक्ष रामविलाश पासवान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुयी है। हालांकि कांग्रेस अपनी नयी जमीन तलाशने के प्रयास में नए-नए प्रयोग कर रही है।
फिलहाल बिहार का चुनावी रंगमंच बनकर तैयार है। सभी किरदार अपनी बदली भूमिका में नजर आ रहे हैं। कौन किसको अपने गले लगाएगा और किसकी पीठ में खंजर चुभायेगा यह जानने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन राजनीति के धुरंधरों की मांग बढ़ रही है। चौपालों और कस्बों में चुनावी चर्चा जोर पकड़ रही है। बहस का मुद्दा फिलहाल यही है कि नीतीश कुमार दुबारा सत्ता हासिल करेंगे या फिर लालू प्रसाद यादव और उनके राजनीतिक कुनबे की वापसी होगी। बसपा एवं सपा भी इस खेल को रोचक बनाने में जुटे हुए हैं। इन सबसे अलग कांग्रेस अकेले दम पर ताल ठोंककर अपनी खोई जमीन वापस लाने को बेकरार है।
Monday, June 21, 2010
ट्वीट-ट्वीट
सेलेब्रिटी और उनकी निजी जिंदगी हमेशा से लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है। आम लोग जिसे पर्दे पर ऐक्ट करते या दूर मैदान में खेलते देखते हैं उनके साथ होने का कोई मौका भला कैसे छोड़ सकते हैं। उसके सामने आने पर वे धक्का मुक्की तक कर बैठते हैं पर ट्विटर की आभासी दुनिया में यह परेशानी नहीं है।
फॉलोअर्स में सेलेब्रिटी के नजदीक बने रहने का मनोविज्ञान काम करता है लेकिन यहां भी वे अपनी प्राइवेसी में आपको उतना ही शामिल करते हैं जितने से आप उनके लिए परेशानी का सबब न बनें। वे कहेंगे लोग सुनेंगे। झूमेंगे या सिर धुनेंगे। कुछ मामलों में इससे ज्यादा भी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए ट्विटर पर सचिन के आह्वान पर बड़े से बड़ा कंजूस भी कैंसर के लिए अपनी गांठ खोल बैठा और कुछेक घंटों में ही साठ लाख से ज्यादा रुपये इकट्ठा हो गए! यह सेलेब्रिटी ट्विट की महिमा है।
भारत में ट्विटर सुखिर्यों में आया पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की ट्विट्स से। सिर्फ १४० अक्षरों के कुछ ट्विट्स ने यूपीए सरकार के लिए परेशानियों के कई अवसर जुटा दिए। इसी ट्विटर ने आईपीएल में भ्रष्टाचार मामले को गर्माया और पहले थरूर और बाद में आईपीएल चीफ ललित मोदी को अपने अपने पदों से हाथ धोना पड़ा। अब कोई सेलेब्रिटी किसी मसले में अपने को घिरा हुआ पाता है तो तत्काल ट्विटर पर सफाई पेश करने में जुट जाता है। आप पाएंगे कि ट्विटर पर इस मकसद से इंट्री मारने वाले सेलेब्रिटी की तादाद उसके रेग्युलर ट्विट करने वालों से कहीं ज्यादा है। उन्हें तवा गर्म होने का इंतजार रहता है। वह गर्म हुआ नहीं कि वे रोटी सेंकने बैठ जाएंगे। अक्सर आलोचना झेलने वाले गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी की हालिया ट्विट इसका एक प्रमाण है। उन्होंने लिखा है कि एनडीटीवी ने देश भर में ३४ हजार लोगों का सर्वे किया। ८५ फीसदी लोगों ने माना कि मैं बेस्ट परफॉमिर्ंग सीएम हूं। उधर पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमान मलिक ट्विटर जॉइन कर चिदंबरम को न्यौत रहे हैं। शाहरुख खान ट्वीट करते हैं काफी दिनों बाद आइसक्रीम खाई। कहा जाता है कि यह सर्दी जुकाम के लिए बेहतर है। उनके फॉलोअर्स इस बात पर अनेक तरह से रायशुमारी करते हैं। बिग बी यानि अमिताभ बच्चन ट्वीट करते हैं और उनके प्रशंसक उस पर प्रतिक्रिया करते हैं। आज कल सेलेब्रिटी से लेकर आम आदमी तक ट्वीट कर रहा है। हालांकि ट्वीट से कुछ लोगों को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है पर इसका नशा ही कुछ ऐसा है कि लोग ट्वीट करने से बाज नहीं आते। शाहरुख सेलेब्रिटी हैं इसीलिए उनके आइसक्रीम खाने से लेकर अपनी बच्ची को स्वीमिंग के लिए ले जाने जैसी मामूली बातों में भी हमारी रुचि है। हमारा आपका जीवन इतना मामूली है कि उसमें बहुत खास मौकों पर भी आप ट्विटर पर कुछ लिखें तो वह बात आपके आठ दस दोस्तों के बीच घूम फिर कर खत्म हो जाएगी। हालांकि ट्विटर पर अकाउंट खोलना बाएं हाथ का खेल है लेकिन यह तथ्य है कि यह हमारे आपके नहीं, सेलेब्रिटीज के काम की चीज बन गई है। आप क्या कर रहे हैं, क्या खा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं या आपके गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड कौन हैं जैसे सवालों के जवाब में यदि आप की जगह दीपिका पादुकोण को रख दिया जाए तो उसमें लोगों की दिलचस्पी अचानक बढ़ जाती है।
विभिन्न क्षेत्रों के सेलेब्रिटीज के इस नये प्रेम पर गहराई से विचार करें तो कुछ और बातें भी साफ होती हैं। ऐसे वक्त में जब अफवाह, गलतबयानी और गॉसिप को बड़े ध्यान से सुना जाता है, स्टार्स इसका अपने हक में इस्तेमाल न करें, यह असंभव है। आश्चर्य नहीं कि ट्विटर के पहले और इसके समानांतर भी बॉलिवुड में गॉसिप का अच्छा खासा बाजार रहा है। एक आंकलन के मुताबिक स्टार्स और फिल्म मेकर्स ऐसी गॉसिप को प्लांट करने के लिए सालाना १५ से २५ करोड़ की रकम खर्च करते हैं। ऐसे में ट्विटर उनके लिए एक सुविधाजनक यंत्र की तरह उभरा है। अपने फैंस और फॉलोअर्स तक ऐसी गॉसिप को पहुंचाने के लिए पहले जहां वे मीडिया के विभिन्न माध्यमों का सहारा लेते थे, ट्विटर के जरिए अब वे सीधे उन तक पहुंच रहे हैं। उन्हें किसी बात को खासो आम तक पहुंचाने के लिए इंतजार नहीं करना है। वे अपनी सुविधा और शर्तों पर ट्वीट कर रहे हैं। इस तरह उनकी पीआर अपने आप हो रही है और उनके मन से यह डर भी जाता रहा है कि उनकी बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाएगा।
ट्विटर में जिस मिजाज की बातें लिखी जाती हैं, उसका फायदा यह भी है कि विवाद होने पर उससे आसानी से पल्ला झाड़ा जा सकता है। कोई भी सेलेब्रिटी आसानी से यह कह कर विवाद को खारिज कर सकती है कि अरे वह तो बेहद हल्के फुल्के ढंग से उसने ऐसा कहा था लेकिन दूसरी तरफ इसी की आड़ में दूसरों पर फब्ती भी कसी जा सकती है, अपने दाग धब्बे धोए जा सकते हैं। जहां स्टार्स की जिंदगी को हसरत भरी निगाहों से देखने और वैसी ही जिंदगी बसर करने का ख्वाब देखने वालों की तादाद बढ़ी है, वहां स्टार की इमेज का भी महत्व होगा ही। रितिक रोशन शिरडी में बदसलूकी करते हैं और ट्विटर पर आकर उसके लिए अफसोस जाहिर करते नजर आते हैं। इन सबके बीच एक्ट्रेस मिनीषा लांबा की ताजा ट्विट काबिले गौर है ट्विटर से बोर हो रही हूं।
सकते में राजनीति
छोटे दल इतने खतरनाक हो सकते हैं। सभी राष्ट्रीय दलों इसका एहसास उत्तर प्रदेश में होने लगा है। दो साल पूर्व गठित पीस पार्टी आफ इंडिया ने डुमरियागंज विधानसभा उप चुनाव में अपनी दमदार उपस्थिति से राष्ट्रीय दलों को जिस तरह चौंकाया, उससे स्पष्ट है कि आगामी विधानसभा चुनाव में तमाम छोटे राजनीतिक दल महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। हालांकि डुमरियागंज विधानसभा उप चुनाव में बसपा को सफलता मिली है और पीस पार्टी के बढ़ते प्रभाव का उस पर असर नहीं दिखाई दिया है। फिर भी इस चुनाव में पीस पार्टी न सिर्फ नंबर दो पर रही, बल्कि सपा और कांग्रेस को चौथे और पांचवे स्थान पर धकेलने में सफल पीस पार्टी रही।
एक ऐसा राजनीतिक दल न जिसका जन्म ही दो साल पहले हुआ हो इतने अल्पसमय हो, उसने, उपचुनाव में सपा, भाजपा और कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया। उसने शैशव काल में ही दिग्गज राजनीतिक दलों को झटका देते हुए अपनी प्रभावशाली उपस्थिति का अहसास करा दिया। हालांकि पीस पार्टी मुख्य रूप से मुस्लिम संगठन माना जाता है लेकिन उसने डुमरियागंज विधानसभा उपचुनाव में एक ब्राहमण प्रत्याशी को मैदान में उतारकर मुस्लिम-ब्राहमण का समीकरण बनाया व सपा और कांग्रेस को पीछे धकेल दिया। सफलता बसपा को जरूर मिली लेकिन १७.७ प्रतिशत मत प्राप्त करके पीस पार्टी ने अन्य दलों को सदमें में डाल दिया। कांग्रेस जैसी पार्टी को पांचवा स्थान मिलना उसे फिर से सोचने पर मजबूर करता है। यह कांग्रेस के लिए झटका कहा जा सकता है क्योंकि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए वह राहुल गांधी के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा कर रही थी।
राजनीतिक विश्लेषक इन परिणामों को कांग्रेस के मिशन २०१२ के लिए शुभ संकेत नहीं मानते। उनका कहना है कि यह सच है कि जनता कांग्रेस को एक बार फिर पसंद कर रही है लेकिन जहां पर स्थानीय मुद्दों की बात होती है वहां अभी भी लोग छोटे दलों पर निर्भर हैं। इन राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जिस तरह से कभी समाजवादी पार्टी ने यादव, मुस्लिम और ब्राहमण गंठजोड़ से प्रदेश में अपना जनाधार बढ़ाया था और बहुजन समाज पार्टी ने ब्राहमण, मुस्लिम व पिछड़ी जातियों के बूते पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी थी वैसा करिश्मा छोटे दल शायद ही कर सकें लेकिन वे बड़ी पार्टियों का गड़ित जरूर बिगाड़ सकते हैं। इसी फलसफे के आधार पर पीस पार्टी प्रदेश में जनाधार बढ़ाने का काम कर रही है।
हालांकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी के बढ़ते प्रभाव से सांप्रदा विकल्प मतों के बढ़ने का भी खतरा बढ़ गया है। इसका अंदाजा डुमरियागंज चुनाव से लगाया जा सकता है। जहां भाजपा प्रदेश में जनाधार विहीन होते हुए भी नं.तीन पर रही। पीस पार्टी/ का जन्म मूलतः मुस्लिम समुदाय को ही एक जुट करने और उसको मजबूत करने के लिए हुआ था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम एकजुटता से नाराज हिंदूओं का भी ध्रुवी करण हो सकता है। गोरखपुर के सांसद महंत योगी आदित्य नाथ ने हिंदू ध्रुवीकरण के लिए अभियान छेड़ रखा है।
ऐसा माना जा रहा है कि पीस पार्टी के गठन से पूर्वी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक शक्तियों का भी एकजुट होना प्रारंभ हो गया है। पूर्वांचल के सपा और कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि पीस पार्टी का गठन गोरखपुर के सांसद योगी आदित्य नाथ के इशारे पर ही किया गया है। योगी पूर्वांचल में पीस पार्टी के गठन के बाद से हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़का कर हिंदू मतों का ध्रुवीकरण करने की योजना में जुट गए हैं। इन नेताओं का मानना है कि पीस पार्टी का उदय धर्मनिरेपक्ष ताकतों के लिए बहुत बड़ा खतरा बनने जा रहा है और प्रदेश की जनता को इससे सावधान रहना होगा।
पीस पार्टी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को एकजुट करने और इस समुदाय को मजबूत मंच देने के उद्देश्य से हुआ था। पार्टी के संस्थापक डाक्टर अयूब पूर्वी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण शहर गोरखपुर के सफलतम चिकित्सकों में से एक माने जाते हैं। उनकी पार्टी को २००७ के विधानसभा चुनाव में पैरों का निशान चुनाव चिन्ह मिला था। २००९ के लोकसभा चुनाव के दौरान इसी चुनाव चिन्ह पर इस पार्टी ने मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वर्तमान समय में पीस पार्टी का प्रभाव आजमगढ़, सिद्धार्थ नगर, गोंडा, संतकबीर नगर, जौनपुर, देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज और बस्ती में है। धीरे-धीरे यह इन क्षेत्रों में जनाधर बढ़ाकर मुस्लिमों को एकजुट करने का काम कर रही है। इससे सपा, भाजपा कांग्रेस सहित अन्य प्रमुख दलों की पूर्वांचल में नींद उड़ रही है। अगर आगामी विधानसभा चुनाव में भी इस पार्टी का यह जादू चला तो सबसे बड़ा झटका कांग्रेस और सपा को लग सकता है। यह दोनो ही दल मुस्लिम वोटों पर निर्भर हैं।
यह भी कहा जा रहा है कि अगर आगामी विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस सत्ता की दहलीज तक नहीं पहुंच पाते तो उसकी एक बड़ी वजह पीस पार्टी सहित अन्य छोटे दल भी होंगे। इसी तरह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के लिए एक और दल भारतीय समाज पार्टी भी खतरा बन सकता है। ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजभर समुदाय के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों में अच्छा खासा प्रभाव रखती है। पार्टी के कर्ता धर्ता ओमप्रकाश राजभर अपने समुदाय को अनुसूचित जाति की श्रेणी में सूचीबद्ध कराने का भी प्रयास कर रहे हैं, इससे वह राजभर समुदाय के बीच यह जताने का प्रयास कर रहे हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश के कम से कम १२ विधानसभा क्षेत्रों में राजभर समुदाय की अच्छी खासी आबादी है। जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में सपा, कांग्रेस, भाजपा और बसपा को मुसीबत खड़ी हो सकती है। अगर आगामी चुनाव में भारतीय समाज पार्टी को कुछ सफलता मिलती है तो वह सपा, बसपा या कांग्रेस से समझौता करने में पीछे नहीं रहेगी। इसकी वजह उनके अपने हित और राजनीतिक समीकरण हैं। डुमरियागंज में पीस पार्टी को मिली ताजा सफलता के पीछे भारतीय समाज पार्टी के योगदान को भी अहम माना जा रहा है । भारतीय समाज पार्टी ने डुमरियागंज विधानसभा उपचुनाव में पीस पार्टी का समर्थन किया था।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इन छोटे दलों की प्रदेश में बढ़ती लोकप्रियता बड़े दलों के लिए मुसीबत बन रही है। इनका मानना है कि छोटे दलों का अपना खस वोट बैंक है, जिसे अपने हिसाब से वह चाहें जिधर प्रयोग कर सकते हैं। समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन छोटे दलों के बढ़ते जनाधार का खामियाजा सपा को सबसे ज्यादा भुुगतना पड़ा है। मुख्य रूप से पीस पार्टी के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों में नया ध्रुवीकरण होने से सपा का प्रदर्शन लगातार धरातल की ओर जा रहा है। २००९ के लोकसभा चुनाव के दौरान भी यही तमाम छोटे-छोटे दल समाजवादी पार्टी के लिए खतरा बने थे। राजनीतिक विश्लेषकों को यह भी लगता है कि यह प्रवृत्ति प्रदेश की राजनीति के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। अब जातिवाद की राजनीति के अगले चरण में उपजाति और समुदाय की भी रणनीति अमल में लायी जानी शुरू हो चुकी है। इससे समाज में विभाजन की रेखा तो खिंचेगी ही लेकिन तात्कालिक लाभ की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहन मिलेगा। सामाजिक वैज्ञानिक डा. एस के सिंह कहते हैं कि प्रमुख राजनीतिक दलों अपने राजनीतिक मतभेद भुलाकर देश और प्रदेश के हितों को तय करना चाहिए। अगर अब भी ये सचेत न हुए और इन दलों की अनदेखी की गयी तो एक दिन यही बड़े दलों के लिए समस्या पैदा कर सकते हैं।
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