Saturday, May 22, 2010
कोल महिलाओं का दर्द
जंगे आजादी के दौर में गुलामी की जंजीरे काटने और गोरों को हिंदुस्तानी सरहदों के पार खदेड़ने के लिये बुंदेलखंड मेंं चित्रकूट के पाठा के कोलों की दर्द भरी चीखें अब भी सुनाई देती हैं। चिलचिलाती धूप और लू में नंगे बदन श्रीमंतों और सामंतों की जमीन जोतने, हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले कोल परिवार यहां के दादुओं और दबंगों के कर्ज में इस कदर डूबे हैं कि इसके बोझ से उबरने के लिए अपनी बहू और बेटियों को जिस्मानी रिश्ते कायम करने की शर्मनाक इजाजत दे देते हैं। ददुआ-ठोकिया जैसे डकैतों से पुलिस ने भले इन्हें निजात दिला दिया हो लेकिन छुटभैये साहूकार, दबंग से लेकर सरकारी हुक्मरान तक के मकड़जाल में ऐसे जकड़े हैं कि इसे तोड़ पाना इनके बस की बात नहीं है। किसी तरह गुजर बसर करने वाले कोल जनजाति के लोग जठराग्नि को बुझाने के लिए घने बीहड़ों से लकड़ी बगैरह काटते या बंधुआ मजदूरी करते हैं। परिवार के भरण पोषण में महिलाएं अधिक हाड़ तोड़ मेहनत करती हैं। घने सुनसान जंगलों से शहद, गोंद, महुआ, चिरौंजी, आंवला, बूटियां बारसिंघा के सींग व जानवरों की खाले संजोकर बेचना इनका काम है। अधिकतर महिलाएं जंगलों से लकड़ियां, शहद, जड़ी बूटियां एकत्र कर रेल से बांदा-सतना-इलाहाबाद-झांसी आदि स्थानों तक पहुंचाती हैं। ये औने पौने लकड़ियां बेचकर अपने परिवार के लिए रोजी रोटी का जुगाड़ करती हैं। यह महिलाएं लकड़ियां एकत्र करती हैं। शहरों में लकड़ी बेचने वाली कोल औरतें अक्सर जीआरपी व आरपीएफ के वर्दीधारी जवानों या सफेदपोश लोगों की कामुकता का शिकार भी हो जाती हैं। वन विभाग का कहर भी इन पर टूटता है। अवैधानिक तरीकों से ये रेल में सफर करती हैं। इसलिए रेल कर्मचारी भी इनका शोषण करते हैं। कोल समुदाय की बालिकाओं को भी कई अनचाहे समझौते करने पड़ते हैं।दबंग दादू से लेकर सरकारी ओहदेदार इनके नाम से सरकारी अनुदान व ऋण हड़पने में कोई देरी नहीं करते। जब कुर्की वारंट आता है तो कोलों को दबंग दादुओं के पैर की जूती को माथे का चंदन बनाना पड़ता है। इतना ही नहीं सरकारी कर्जे से मुक्ति हेतु पहले तो जमीन जायदाद लिखवा ली जाती है फिर बहू बेटियों को भेजने की शर्त रखी जाती है। शुष्क पठारी एवं सूखाग्रस्त इलाका, जहां एशिया की सबसे बड़ी पेयजल योजना सफेद हाथी साबित हुई वहां ' भौरा तोरा पानी गजब कर जाए, गगरी न फूटे चाहे खसम कर जाये' गाने को विवश होती हैं। यहां कोलों की महिलाओं को रखैल के रूप में रखा जाना रिवाज रहा है। जब पुराने जख्म हरे हो जाते हैं तो लोग चीखते हैं, कराहते हैं।
आसान नहीं डगर
तमाम अफवाहों और झंझटों से जूझते हुए अंततः भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश में सूर्य प्रताप शाही के हाथ में पार्टी की कमान सौंप दी। लगभग मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी पार्टी को पुर्नर्जीवित करने की अभिलाषा संजोए संगठन के नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही की पहचान न तो राष्ट्रीय स्तर पर और न ही प्रदेश के बड़े नेता के तौर पर की जाती है। आज भी उन्हें पूर्वांचल का ही नेता माना जाता है।फिलहाल नयी भूमिका में वे संगठन में कितनी जान फंूक पाते हैं यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि प्रदेश संगठन के अब तक जितने कद्दावर नेता हुए हैं उनका भी बड़ा जनाधार नहीं रहा। हालांकि वे पार्टी में बड़े कद के नेता जरूर माने जाते रहे हैं। चाहे पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह हों या फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र अथवा सांसद लालजी टंडन सबका यही हाल है। विनय कटियार और ओम प्रकाश सिंह सबकी सीमायें जगजाहिर हैं। प्रांतीय संगठन में पिछड़ों के नेता होने का दम भरने वाले ओम प्रकाश सिंह भी कुछ खास न कर सके। प्रदेश भाजपा में टांग खींचू राजनीति का यह खेल अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका है। ऐसे में नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही धुरंधरों एवं बंटे समर्थकों के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं यह एक यक्ष प्रश्न है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रदेश भाजपा का ग्राफ २००२ से लगातार गिरता जा रहा है। इस दौरान पार्टी अपना खोया जनाधार पाने के लिए कई प्रयोग कर चुकी है। विनय कटियार से लेकर रमापति राम त्रिपाठी तक को कमान सौंपी जा चुकी है। अब तक आजमाये गये नुस्खों से पार्टी की सेहत ठीक होना तो दूर की बात उसमें सुधार के लक्षण भी नजर नहीं आ रहे हैं। इन नुस्खों का परिणाम यह जरूर देखने को मिला कि पार्टी प्रदेश में दूसरे नंबर से खिसक कर चौथे नंबर पर पहुंच गई है। अब ऐसी विषम परिस्थिति में सूर्य प्रताप शाही किस हद तक और कैसे सफल हो पाते हैं, यह ज्वलंत प्रश्न है। प्रदेश भाजपा के नये सेनापति की अब तक की राजनैतिक क्षमता, योग्यता एवं उनके अतीत को जानना कम दिलचस्प नहीं होगा। प्रदेश भाजपा में ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त तमाम तरह की विकृतियों को यदि एक तरफ कर दिया जाए और नवनियुक्त अध्यक्ष से चमत्कार की उम्मीद की जाए तो यह बेमानी होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के ग्राम पकहाँ, थाना पथरदेवाँ (वर्तमान थाना बघऊच घाट) के मूल निवासी सूर्य प्रताप शाही ने १९८० से २००७ नौ चुनावी महासमर में ताल ठोंकी है। जिसमें से मात्र तीन बार ही जीते, ६ बार उन्हें करारी शिकस्त का स्वाद चखना पड़ा। आर.एस.एस. से संबंध रखने वाले सूर्य प्रताप शाही अपने जीवन में पहली बार कसया विधानसभा से १९८० में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े। तब इन्हें कुल २००० मत ही प्राप्त हो सके। १९८५ के चुनाव में इसी विधानसभा सीट पर उन्होंने अपने निकटतम निर्दल राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को २५० मतों से पराजित किया था। जबकि १९८९ के आम चुनाव में इसी सीट पर जनता दल के प्रत्याशी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग बारह हजार मतों से उन्हें हराया। दो वर्ष बाद हुए चुनाव में राम लहर के कारण शाही ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को पराजित करने में कामयाब हुए। जबकि १९९३ के चुनाव में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग पंद्रह हजार मतों से शाही को पराजित किया। आखिरी बार १९९६ में उन्हें मिली। २००२ एवं २००७ में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने उन्हें हराया। १९९१ में चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे भाजपा के इस महारथी को प्रदेश सरकार में पहली बार गृह राज्यमंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। १९९६ में वे आबकारी मंत्री भी बने। शाही के मंत्री पद का दोनों कार्यकाल विवादों से घिरा रहा। बतौर गृह राज्यमंत्री उनका कार्यकाल इत्िाहास के काले पन्नों में दर्ज है। उनके इस कार्यकाल में ही बहुचर्चित पथरदेवाँ बलात्कार कांड की गूंज लोकसभा से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गूंजी। अब ऐसे में यह स्वतः विचारणीय हो जाता है कि सूर्य प्रताप शाही मृत पड़ी प्रदेश भाजपा में जान फूंकने का कार्य कैसे करेंगे। भाजपा की पूर्वांचल की राजनीति भी उनके लिए निष्कंटक नहीं है। यहां उन्हें गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्य नाथ से जूझना होगा। योगी शुरू से ही उन्हें प्रदेश भाजपा की कमान सौंपे जाने के खिलाफ थे। ऐसे में वह सूर्य प्रताप शाही का किस हद तक और कितना साथ देंगे यह देखना दिलचस्प रहेगा। योगी आदित्य नाथ के प्रकोप से पूर्वांचल में भाजपा के वरिष्ठ नेता शिव प्रताप शुक्ल आज तक नहीं उतर सके हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वे घटक उनका कितना साथ देंगे जो इस बार अपना प्रतिनिधि बतौर प्रदेश अध्यक्ष चाहते थे। वैसे सूर्य प्रताप शाही ने एक काम अच्छा किया। वे सड़क मार्ग से लोगों से मिलते जुलते हुए लखनऊ पहुंचे। उनकी निगाह ट्विटर जैसे आधुनिक संचार माध्यमों पर भी हैं। वैसे यहां उनकी मौजूदगी पर पार्टी का एक वर्ग नाराज भी है।
Thursday, May 20, 2010
अपमानित करनें का अभियान चल रहा
बसपा मंत्रियों के संरक्षण में प्रकाशित होने वाली अंबेडकर टुडे पत्रिका के मई अंक में हिन्दुओं खासकर सवर्णों को बुरी तरह से अपमानित करनें का अभियान चल रहा है। इसका प्रत्यक्ष नजारा देखना हो तो अम्बेडकर टुडे पत्रिका का मई २०१० का ताजा अंक देखिए जिसके संरक्षकों में मायावती मंत्रिमण्डल के चार चार वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों के नाम शामिल हैं। इस पत्रिका के मई २०१० अंक का दावा है कि हिन्दू धर्म मानव मूल्यों पर कलंक है, त्याज्य धर्म है, वेद जंगली विधान है, पिशाच सिद्धान्त है, हिन्दू धर्म ग्रन्थ धर्म शास्त्र धर्म शास्त्र धार्मिक आतंक है, हिन्दू धर्म व्यवस्था का जेलखाना है, रामायण धार्मिक चिन्तन की जहरीली पोथी है, और सृष्टिकर्ता (ब्रह्या) बेटी(कन्यागामी) हैं तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दलितों के दुश्मन हैं।उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित जौनपुर जिला मुख्यालय से मात्र तीनचार किलोमीटर की दूरी पर स्थित भगौतीपुर (शीतला माता मंदिर धाम चौकियाँ) से एक मासिक पत्रिका अम्बेडकर टुडे प्रकाशित होती है जिसके मुद्रक प्रकाशक एवं सम्पादक हैं कोई डाक्टर राजीव रत्न। डॉ० राजीव रत्न के सम्पादन में प्रकाशित होनें वाली मासिक पत्रिका का बहुत मजबूत दावा है कि उसे बहुजन समाज पार्टी के संगठन से लेकर बसपा सरकार तक का भरपूर संरक्षण प्राप्त है और यह पत्रिका बहुजन समाज पार्टी के वैचारिक पक्ष को इस देश प्रदेश के आम आदमी के सामनें लानें के लिए ही एक सोची समझी रणनीति के तहत प्रकाशित हो रही है। यही कारण है कि इस पत्रिका के सम्पादक डॉ० राजीव रत्न अपनी इस पत्रिका के विशेष संरक्षकों में मायावती मंत्रिमण्डल के पांच वरिष्ठ मंत्रियों क्रमशः स्वामी प्रसाद मौर्य (प्रदेश बसपा के अध्यक्ष भी हैं।), बाबू सिंह कुशवाहा, पारसनाथ मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दकी, एवं दद्दू प्रसाद का नाम बहुत ही गर्व के साथ घोषित करते हैं। पत्रिका का तो यहाँ तक दावा है कि पत्रिका का प्रकाशन व्यवसायिक न होकर पूर्ण रूप से बहुजन आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर जनजन तक पहुँचानें एवं बुद्ध के विचारों के प्रचारप्रसार के लिए किया जा रहा है। बसपाई मिशन में जीजान होनें से जुटी इस पत्रिका के मई २०१० के पृष्ठ संख्या ४४ से पृष्ठ संख्या ५५ (कुल १२ पेज) तक एक विस्तृत लेख धर्म के नाम पर शोषण का धंधा वेदों में अन्ध विश्वास शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इस लेख के लेखक कौशाम्बी जनपद के कोई बड़े लाल मौर्य हैं। लेखक बड़ेलाल मार्य नें वेदों में मुख्यतः अथर्व वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद के अनेकोनेक श्लोकों का कुछ इस तरह से पास्टमार्टम किया है कि यदि आज भगवान वेद व्यास होते और विद्वान लेखक की विद्वता को देखते तो शायद वे भी चकरा जाते।लेखक का कथन है कि देवराज इन्द्र बैल का मांस खाते थे (पृष्ठ संख्या ५३)। पृष्ठ संख्या ५३ पर ही दिया गया है कि वैदिक काल में देवताओं और अतिथियों को तो गो मांस से ही तृप्त किया जाता था। पृष्ठ संख्या५४ पर विद्वान लेखक का कथन प्रकाशित है कि वेदों के अध्ययन से कहीं भी गंभीर चिन्तन, दर्शन और धर्म की व्याख्या प्रतीत नहीं होती। ऋग्वेद संहिता में कहीं से ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि यह देववाणी है, बल्कि इसके अध्ययन से पता चलता है कि यह पूरी शैतानी पोथियाँ हैं। आगे कहा गया है कि वेदों में सुन्दरी और सुरा का भरपूर बखान है, जो भोग और उपभोग की सामग्री है। पत्रिका के इसी अंक के पृष्ठ संख्या ३१ पर मुरैना मध्यप्रदेश के किसी आश्विनी कुमार शाक्य द्वारा हिन्दुओं खाशकर सवर्णों की अस्मिता, मानबिन्दुओं, हिन्दू मंदिरों, हिन्दू धर्म, वेद, उपनिषद, हिन्दू धर्म ग्रन्थ, रामायण, ईश्वर, ३३ करोड़ देवता, सृष्टिकर्ता ब्रह्या, वैदिक युग, ब्राह्यण, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, को निम्न कोटि की भाषा शैली में गालियाँ देते हुए किस तरह लांक्षित एवं अपमानित किया गया है इसके लिए देखें पत्रिका में प्रकाशित बॉक्स की पठनीय सामग्री।उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार द्वारा पालित एवं वित्तीय रूप से पोषित अम्बेडकर टुडे पत्रिका के इस भड़काऊ लेख नें प्रदेश में सवर्ण बनाम अवर्ण के बीच भीषण टकराव का बीजारोपड़ तो निश्चित रूप से कर ही दिया है। पत्रिका के इस लेख पर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से मात्र अस्सी किलोमीटर दूर रायबरेली में १४ मई को अनेक हिन्दू संगठनों नें कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए पत्रिका की होली जलाई जिस पर जिला प्रशासन नें पूरे इलाके को पुलिस छावनी के रूप में तब्दील कर दिया था। रायबरेली में स्थिति पर काबू तो पा लिया गया है पर यदि इसकी लपटें रायबरेली की सीमा से दूर निकली तो इस पर आसानी से काबू पाना मुश्किल होगा।फिलहाल इस घटना की जानकारी के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कार्रवाई करते हुए न केवल अंबेडकर टुडे पत्रिका को जब्त करने का आदेश दिया है बल्कि इस पूरे मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराने का फैसला किया है। साथ ही पत्रिका के संपादक ने भी पत्रिका में छपे लेख को लेकर माफी मांगी है। मायावती प्रशासन द्वारा खबर प्रकाशित होने के बाद देर रात मुख्यमंत्री सचिवालय में एक आपात बैठक बुलाई गयी जिसमें अंबेडकर टुडे के संपादक डॉ राजीव रत्न को भी तलब किया गया। उनसे लिखित रूप में यह आश्वासन लिया गया कि वे अपनी पत्रिका में जिन पांच मंत्रियों का नाम प्रकाशित कर रहे हैं उसके लिए उनके पास कोई सहमति नहीं है। उनसे लिखित आश्वासन लेने के बाद सरकार ने जौनपुर डीएम को आदेश जारी किया कि वे पत्रिका का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने की कार्रवाई सुनिश्चित करें। साथ ही सरकार ने आदेश जारी किया है कि इस पत्रिका की समस्त प्रतियों को जब्त कर लिया जाए। इसके साथ ही तत्काल निर्णय लिया गया कि इस पूरे मामले की सीबीसीआईडी से जांच करवाई जाएगी।इसके बाद १९ मई को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अंबेडकर टुडे पत्रिका के मई २०१० के अंक में धर्म विशेष के बारे में अशोभनीय, अमर्यादित एवं आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन के मामले को गंभीरता से लेते हुए सीबीसीआईडी से जांच के आदेश दिये हैं ताकि इस लेख के माध्यम से सामाजिक सौहार्द को ठेस पहुंचाने की साजिश का पर्दाफाश हो सके।
Saturday, April 24, 2010
आईपीएल यानि इंडियन पंगा लीग
आईपीएल थ्री इस बार ढेर सारे विवाद भी छोड़ गया। इसकी शुरूआत हुई मोदी व थरूर के विवाद के साथ। कोच्चि टीम की खरीदारी को लेकर ललित मोदी और शशि थरूर के बीच उठे विवाद ने आईपीएल की जडे़ं हिला दी। रही सही कसर शशि थरूर की दोस्त सुनंदा पुष्कर ने पूरी कर दी। इन्हें ७० करोड़ रुपये की फ्री इक्विटी दी गयी थी। इस मामले को ललित मोदी ने मीडिया में लीक कर दिया। थरूर पर आरोप है कि इस सौदे को पटाने के लिए उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल किया। ललित मोदी, शशि थरूर व उनकी महिला मित्र सुनंदा पुष्कर के बीच उभरे विवाद ने देश की राजनीति को ही नया मोड़ दे दिया। इस मुद्दे पर देश के राजनीतिक दल आपस में बंट गए। थरूर को जहां अपना पद छोड़ना पड़ा वहीं भाजपा नेता अरुण जेटली ने आईपीएल चेयरमैन ललित मोदी को कटघरे में खड़ा कर दिया। थरूर की विदाई के बाद जब मोदी पर शिंकजा कसना शुरू हुआ तो एक के बाद एक भयानक राज खुलते नजर आये। मसलन आईपीएल के सारे मैच फिक्स होते हैं। इसके मार्फत बड़े पैमाने पर काला धन सफेद किया जा रहा है। स्विस बैंकों, सिंगापुर, मलेशिया व दुबई का काला धन सफेद हो रहा है। मैच फिक्सिंग में कई बड़े खिलाड़ी शामिल हैं। मैच फिक्स कराने में एक विदेशी कप्तान व कई नामचीन भारतीय खिलाड़ी शामिल हैं। यह सन २००० के मैच फिक्सिंग विवाद से ज्यादा गहरा है। इसमें न सिर्फ सत्ता पक्ष बल्कि उसकी सहयोगी पार्टियों के कई नेता फंसते नजर आ रहे हैं । कांग्रेस सांसद व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर के अलावा अब प्रफुल्ल पटेल व शरद पवार भी फंसते नजर आ रहे हैं। पवार की बेटी सुप्रिया सुले व प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा पटेल का नाम सामने आने से राकांपा में जबर्दस्त हड़कंप मचा है। मैचो ंके प्रसारण अधिकार खरीदने को लेकर विवादों के घेरे में आयी कंपनी मल्टी स्क्रीन मीडिया में सुप्रिया सुले के पति सदानंद सुले की हिस्सेदारी है। आईपीएल में बतौर हास्पिटैलिटी मैनेजर पूर्णा पटेल की हिस्सेदारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।आईपीएल से जुड़ा विवाद इतना गहराया कि प्रधानमंत्री को दो बार अपने संकटमोचक व वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को चर्चा के लिए बुलाना पड़ा। विपक्ष समूचे मामले की संयुक्त संसदीय समिति गठित करके जांच कराने पर तुला हुआ है। राजद नेता लालू प्रसाद यादव, सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, जदयू अध्यक्ष शरद यादव, माकपा नेता सीताराम येचुरी सभी इसके खिलाफ हैं। बसपा अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती इस मामले की सीबीआई से जांच कराये जाने की मांग कर रहीं हैं। विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर के अलावा अब प्रफुल्ल पटेल व शरद पवार के भी इस्तीफे की वह मांग कर रहा है। उधर पवार का साफ कहना है कि आईपीएल विवाद से उनका कोई लेना देना नहीं है। वैसे कहा यह भी जाता है कि ललित मोदी उन्हीं की छत्र छाया में पल बढ़ रहे हैं। रहा सवाल मोदी का तो पहले तो उन्होने अपने तेवर दिखाये लेकिन जब बीसीसीआई ने सख्त लहजा अपनाया तो उन्होंने घुटने टेक दिए। अब मोदी खुद पर लगे आरोपों की जांच के लिए वक्त मांग रहे हैं। मोदी का जाना तय है। इसका असर आयोजन के अंतिम चरण में साफ दिखा। सभी फ्रेंचाइजी के खिलाफ अचानक आयकर जांच शुरू हो गयी। फ्रेंचाइजी के मालिकों ने खेमेबंदी शुरू कर दी। मोदी के पक्ष में शिल्पा शेटटी, फारूख अब्दुल्ला व विजय माल्या खड़े नजर आये। बीसीसीइाई व मोदी के बीच में जम करके बयानबाजी हुई। बीसीसीइाई ने आईपीएल अवार्ड का बहिष्कार किया। कई खिलाड़ी भी इस समारोह में नहीं गये। यह ठीक है कि आईपीएल ने अपना नया बाजार बनाया है। उसने क्रिकेट के लाखों नये दर्शक बनाए हैं। एक नये प्रारूप को स्थापित किया है। आईपीएल मैचों को ऊंची टीआरपी मिल रही है। प्रसारक टीवी चैनल को ऊंची दरों पर विज्ञापन मिल रहे हैं। विज्ञापन का पैसा इलेक्ट्रानिक और प्रिंट समाचार माध्यमों में भी बह रहा है। जिनके बड़े दांव हैं, उन सबको फायदा है। यह फायदा इसी तरह चलता रहता अगर ललित मोदी इसे मिल बांटकर खाने में यकीन करते लेकिन उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उनकी मांद में दूसरे लोग डेरा बना लें। मोदी नयी टीम अहमदाबाद की बनवाना चाहते थे लेकिन बाजी कोच्चि ने मार ली। बतौर केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने कोच्चि की तरफ पलड़ा झुकाने में अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया तो मोदी ने कीचड़ का डिब्बा उलट दिया। तब शायद उन्हें यह अंदाजा नहीं रहा था कि उसके भीतर से इतनी गंदगी निकलेगी कि कई चेहरे बदरंग हो जायेंगे। आज हमाम में कई लोग नंगे नजर आ रहे हैं।इस गोरखधंधे के चलते रहने में बड़े-बड़े रसूखदार लोगों के हित सधते थे। खिलाड़ियों को भी इस धंधे की वजह से उतना पैसा मिल रहा है, जो पहले वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे। उनकी आदतें व प्रतिबद्धतायें बदलीं। कई देशों की टीमों के खिलाड़ियों के लिए आईपीएल की जो अहमियत है , वह अपने देश की टीम के साथ खेलने को लेकर नहीं है। कई रिटायर्ड खिलाड़ियों के लिए कमाई का नया जरिया बना आईपीएल। इनमें गांगुली, शेन वार्न, कुंबले, एडम गिलक्रिस्ट, एण्ड्रयूज सायमण्ड्स, मुथैया मुरंलीधरन, सनथ जयसूर्या आदि प्रमुख हैं। बीते दिनों आयकर विभाग भी आईपीएल को लेकर हरकत में दिखाई दिया। आईपीएल कार्यालय में आयकर विभाग के छापे के बाद से यह कहना मुश्किल है कि इससे देश को हो रहे मनोरंजन का ज्यादा हिस्सा खेल से आ रहा है या फिर रंगीन चटपटी चर्चाओं से। किसके पर कतरे जाने वाले हैं। कौन अपने दफ्तर में आखिरी दिन गिन रहा है, किसका कौन सा राज अब बस खुलने ही वाला है, इस तरह की बातें लगातार सुर्खियां बनी रहीं। कई फ्रेंचाइजी मालिकों के होश फाख्ता हो गये। मुंबई हाई कोर्ट ने भी अपनी राय पेश की। यदि हम बीते दिनों की बात करें तो क्रिकेट में कुछ ऐसा ही नजारा १९८० के दशक में शारजाह में देखने को मिला था , जहां अब्दुल रहमान बुखातिर ने दाऊद इब्राहिम समेत दूसरे अंडर वर्ल्ड डान, फिल्मी सितारों, सट्टेबाजों और मैच फिक्सिंग का ऐसा तालमेल रचा, कि क्रिकेट की पूरी दुनिया कलंकित हो गई। उस दौर में केसी सिंह संयुक्त अरब अमीरात में भारत के राजदूत थे। थरूर-मोदी विवाद के बाद उन्होंने एक टीवी चैनल पर कहा कि उस दौर में जो शारजाह में हो रहा था, वह अब उससे भी बड़े स्तर पर आईपीएल में देखने को मिल रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि समस्या कितनी गंभीर रही होगी। ललित मोदी ने कोच्चि टीम में निवेश के स्वरूप को बेनकाब किया तो दूसरी टीमों के स्वामित्व पर भी सवाल उठ खडे़ हुए। अब यह सामने आया है कि कम से कम दो टीमों में मोदी के तीन रिश्तेदारों का हिस्सा है। मोदी पर आरोप लगा है कि टीमों के लिए निविदा के दौरान वे गोपनीय सूचनाएं लीक करते रहे हैं और कोच्चि की टीम मैदान से हट जाए इसके लिए उन्होंने सवा दो अरब रुपये घूस देने की पेशकश की थी।टीमों में निवेश के लिए धन कैसे जुटाया गया इस पर इससे भी गंभीर सवाल हैं। क्या मारीशस रूट से पैसा लाकर मनी लांड्रिंग के जरिये काले धन को गैर कानूनी रूप से सफेद करने के मकसद से उनका कई टीमों में निवेश हुआ? शशि थरूर से सुनंदा पुष्कर का नाम जुड़ा तो यह सवाल भी है कि दक्षिण अफ्रीका की माडल गैब्रिएला दिमित्रिएदस के साथ मोदी के क्या संबंध रहे हैं। आखिर मोदी क्यों चाहते थे कि ग्रैबिएला भारत न आएं। यानी आईपीएल हर तरह के भ्रष्ट आचरण, मर्यादा की अनदेखी और संभवत कानून के उल्लंघन का अखाड़ा बन हुआ है। सब कुछ ठीक ठाक नहीं है, इसके संकेत तो लगातार मिल रहे थे। मगर आईपीएल की सफलता का मीडिया में महिमामंडन इस कदर होता रहा कि सामने दिख रही गड़बड़ियों पर सवाल उठाना मुश्किल लगता था। आईपीएल मैच के दौरान शबाब और शराब में डूबे धनाढ्य दर्शक नाइट क्लब जैसा नजारा पेश करते हैं। आईपीएल मैचों में कैसिनो का अंदाज दिखा। तमाम मुद्दे जो इस बार उठे आईपीएल नाम से चल रहे बड़े तमाशे पर अपनी अप्रिय छाया छोड़ गये । कल तक जिसे क्रिकेट की नई लोकप्रियता और कारोबार में कामयाबी का प्रतीक माना जा रहा था वह आज संदेह के गहरे घेरे में है। आशंकाओं का दायरा इतना बड़ा है कि अब इसकी तुलना अमेरिकी बेसबाल के ब्लैक साक्स घोटाले से की जा रही है। एक दौर में उस टूर्नामेंट में काले धन, अंडर वर्ल्ड, सट्टेबाजों और मैच फिक्सिंग करने वाले खिलाड़ियों का ऐसा जमावड़ा हो गया था कि उसकी सफाई के लिए तत्कालीन अमरीकी प्रशासन को कड़े कदम उठाने पड़े थे। खेल के पीछे छिपा शबाब भी सतह पर आ गया ।पहले सीजन में कम वस्त्रधारी लड़कियों के कारण नैतिक आलोचना का शिकार बना आईपीएल तीसरे सीजन के आते आते बड़े खिलाड़ियों के चंगुल में चला गया। ललित मोदी ने जिस क्रिकेट को कारोबार बनाकर परोसा था, वही उनके गले की हड्डी बन गया। अति सब जगह वर्जित है। ललित मोदी शायद यह भूल गये कि चोरी से कोकीन रखने के आरोप में दो साल जेल काट लेना आसान है, लेकिन एक अरब लोगों के साथ धोखाधड़ी करके साफ बच निकलना मुश्किल है। वे अपने किये की सजा भुगतने की कगार पर हैं।आईपीएल के गठन की सबसे पहली और बड़ी भूल यह रही कि इसमें टीमों के गठन के लिए सात चार की व्यवस्था की गयी है। सात खिलाड़ी भारत के होंगे व चार विदेशों से लाए जाएंगे। यानी एक ही देश का एक खिलाड़ी अगर बैटिंग कर रहा है तो दूसरा उसका प्रतिद्वंदी है। किसी प्रदेश का एक खिलाड़ी यदि इस टीम से खेल रहा है तो दूसरा उस ओर से। भारतीय टीम के खिलाड़ी चूरन की तरह सभी टीमों में बंट गये। अब तक दर्शक जिस टीम भावना के वशीभूत होकर क्रिकेट देखते थे वह काट पीट कर फेंक दी गयी। मुनाफे के शोर में इस फारमेट की सभी खामियां दब गयीं लेकिन विवादों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया। आईपीएल के कमिश्नर ललित मोदी की योजनाएं कहीं से कमजोर नहीं ठहर रही थीं। छह से आठ और भविष्य में दस टीमों का भरा पुरा क्रिकेट परिवार बन गया। ललित मोदी ने सगर्व घोषणा की थी इस साल आईपीएल में २२ हजार करोड़ रुपये का कारोबार हो चुका है। टीमों की कमाई के इतर बीसीसीआई को अकेले वर्तमान साल में ही कोई साढ़े चार से पांच हजार करोड़ कमाई की उम्मीद थी। यह कमाई सिर्फ खेलों से है। टीमों की खरीद-बिक्री से नहीं लेकिन इसी बीच अति मुनाफे की मानसिकता आड़े आ गयी। कोच्चि टीम में रुचि रखने के आरोपी थरूर आईपीएल के लपेटे में आ गये। अपने उच्च संपर्कों और अति महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व के शिकार मोदी ने शशि थरूर से अपनी निजी खुन्नस निकालने के लिए खबर लीक करवाई। यह खबर न बनती अगर सुनंदा का नाम शशि थरूर से न जुड़ा होता।
Tuesday, April 20, 2010
ट्विटर-ट्विटर मतलब किचकिच-किचकिच
आजकल बालीवुड, राजनीति और क्रिकेट की दुनिया के लोग ट्विटर पर छाए हुए हैं। बिग बी, किंग खान, अमर सिंह से लेकर शशि थरूर और ललित मोदी तक। ऐ लोग अक्सर अपने टिवटर के माध्यम से किसी न किसी विवाद में देखे जा सकते हैं। हाल ही में एक नेता ने एक ट्विटर लिखा और पूरे देश की राजनीति ही ट्विटराने लगी। केंद्र सरकार से लेकर विपक्ष तक ट्विटरा रहा है। अगर, आप सोच रहे है कि ये ट्विटर क्या बला है, तो हम बता दें आपको कि ये नवीनतम टेक्नोलॉजी का नवीनतम शौक है। इंटरनेट पर पहले ब्लॉग बहुत पॉप्युलर हुआ था, अब ट्विटर कुछ ज्यादा ही पापुलर हो रहा है। वैसे, ट्विटर इंग्लिश का शब्द है, जिसका एक मतलब किचकिच पन भी कहा जा सकता है। भारतीय भाषा में यह किचकिच पन बिलकुल सटीक बैठ रहा है। फिलहाल आईपीएल को लेकर देश की सरकार सें लेकर सफेदपोश, नौकरशाह सहित दुनिया भर में किचकिच चल रहा है। देश में जो किचकिच यानि कि टविट टिवट चल रहा है, वो एक नेता का लिखे एक ट्विटर से चालू हआ है। ये कोई और नेता नहीं बल्कि शशि थरूर हैं जिन्हें ट्विटराने का बड़ा शौक है। वो पहले भी ट्विटरा चुके हैं। ट्विटराने का कारण, वो कई बार चर्चा में आ चुके हैं। अब इसी टिवटराने के चक्कर में उनकी विदेश राज्य मंत्री की कुर्सी भी चली गयी। अब टिवटर के साथ-साथ ही इनका महिला प्रेम भी जगजाहिर हो चुका है। शशि थरूर आजकल इतने चर्चित हैं जितने कि अपने सीधे व शांतप्रिय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी भी नहीं रहते। आखिर हमारे प्रधानमंत्री जी किचकिच जो नहीं करते। देखा जाए तो यह टिवट टिवट सिर्फ हजारों करोड़ों रुपए के मुनाफे के लिए ही हुई। जिसके चलते मोदी और थरूर की किचकिच हुई और नुकसान उन सफेदपोशों का जिनकी ब्लैकमनी लगी हुई है। उन्हें चिता सताए जा रही है कि अब इसमें सफेदी कैसे आएगी। कमाई यह स्रोत कहीं बंद न हो जाए। क्रिकेट एक खेल है और आईपीएल एक धंधा है। धंधा भी हजारों करोड़ का। जिधर इतना पैसा होता है, उधर सभी टांग अड़ाना चाहते हैं। अभी आगे कई सपैदपोशों के नाम खुलेंगे अगर मोदी सिर्फ बलि का बकरा बनके न रह गए। वैसे आपको याद दिला दें कि ये कोई पहली बार नहीं है, जब देश में ट्विटर ट्विटर, ट्विट ट्विट हुआ है। सनद रहे कि एक बार तोप खरीद को लेकर ट्विटर ट्विटर, ट्विट ट्विट हुआ था। करोड़ों का कमीशन का आरोप था। और याद है, एक बार विदेश से करोड़ों का शक्कर खरीदा गया था। पैसे पहुंच गया, पर शक्कर नहीं आयी और, वो इराक और तेल का कूपन का मामला, जिसमें बलि का बकरा बने नेता ने सबकी पोल खोल देने का धमकी दी थी। वो पोल आज तक नहीं खुली। हमारे देश में कोई पोल खुलती ही कहां है। ट्विटर ट्विटर, ट्विट ट्विट तो ख़ूब होता है, पर असली सच क्या है, ये कभी पता नहीं चलता। कुछ ऐसा ही हाल आईपीएल के मामले भी होगा। निश्चत मानिए किमोदी जैसे लोगों को बलि का बकरा बनाया जाएगा और सभी सफदपोश अपना मुंह पोंछते हुए सफेदी चमका के साफ निकल लेंगे।
Tuesday, April 13, 2010
...चुनौती
आतंकवाद के साथ-साथ नक्सलवाद ने भी देश को पूरी तरह से जकड़ लिया है। देश में नक्सलवाद इस कदर हावी हो गया है कि देश में गृहयुद्ध का खतरा बन गया है। नक्सलवादियों के बढ़ते आधार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय ग्रहमंत्री पी. चिदंबरम की चुनौतियों को नजरदाज करते हुए नक्सलवादियों ने दंतंवाड़ा में ७६ जवानों को मौत की नींद सुला दिया। इस घटना से नक्सलियों ने सीधे-सीधे देश की सुरक्षा को चुनौती दी है। देश में बढ़ता नक्सलवाद आंतरिक लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन गया है।दंतेवाड़ा संहार के बाद इस्तीफे की पेशकश करके केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम भले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष की सहानुभूति बटोरने में कामयाब हो गये हों, लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि नक्सली गतिविधियों को रोकने में सरकार पूरी तरह विफल रही है। इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि नक्सलवाद का खतरा पिछले कुछ महीनों के भीतर काफी तेजी से बढ़ा है। इसके पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि जहां गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने लालगढ़ जाकर लोगों की समस्याओं को समझने की कोशिश की, वहीं माओवादियों ने दांतेवाड़ा में बर्बर हमला करके सीआरपीएफ के ७६ जवानों को मौत की नींद सुला दिया। केंद्र सरकार के आपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ नक्सलियों द्वारा किया गया यह सबसे बड़ा हमला है। इस हमले से एक बात तो साफ हो जाती है कि न सिर्फ राज्य सरकारें बल्कि केंद्र सरकार भी जिस हल्के तरीके से आतंकवाद की समस्या से निपटने की कोशिश कर रही हैं वह उसकी बहुत बड़ी भूल है। आंतरिक लोकतंत्र के लिए बढ़ता नक्सलवाद गंभीर खतरा है। यह बात केंद्रीय गृह मंत्री कई बार विभिन्न मंचों से उठा चुके हैं। उन्होंने इससे निपटने के लिए विस्तारित रणनीति भी बनाई है, जिसे आपरेशन ग्रीन हंट के नाम से जाना जाता है। केंद्र सरकार की इस रणनीति को नक्सल प्रभावित राज्यों आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, महाराष्ट्र तथा बिहार की सरकारों ने ही कभी गंभीरता के साथ नहीं लिया। इसका नतीजा यह निकला कि नक्सलवादियों के मंसूबे बढ़ते चले गये। वे कभी झारखंड में रेल की पटरी उड़ा देते हैं तो कभी पश्चिम बंगाल में नृशंस कार्रवाई में संलग्न नजर आते हैं। हाल ही में उन्होंने छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में बड़ा हमला किया।नक्सल प्रभावित सभी राज्यों में अत्याधुनिक हथियारों से नक्सली गुट लैस हैं। इनकी अच्छी खासी तादाद है। इसे छोटी मोटी लाल सेना भी माना जा सकता है। यह सेना बाकायदा चीन एवं पाकिस्तान द्वारा मुहैया कराये गये हथियारों से लैस हो चुकी है। चूंकि नक्सली गुटों को स्थानीय लोगों का समर्थन प्राप्त है, इसलिए संबंधित राज्य सरकारें एवं जिला प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने में विफल हैं। खास किस्म की जुझारू वामपंथी राजनीति का पैरोकार होने के चलते मानवतावादी संगठनों, साहित्यकारों, लेखकों व बुद्धिजीवियों का भी इन्हें समर्थन प्राप्त है। ये केंद्रीय सुरक्षा बलों को हमेशा बाहरी समझते हैं और उनके साथ शत्रुवत बर्ताव करते हैं। घने जंगल, नदी, नाले तथा प्रतिकूल भौगोलिक पृष्ठभूमि इनकी रणनीतिक ताकत माने जाते हैं। गुरिल्ला युद्ध में माहिर नक्सली अक्सर बड़ी वारदातें कर जाते हैं। केंद्र व संबद्ध राज्य सरकारों के बीच तालमेल व संवाद की कमी का ये अक्सर फायदा उठाते नजर आते हैं।अब इस चुनौती से जूझने का शायद सही वक्त आ गया है। केंद्र व तमाम राज्य सरकारों को आपसी मतभेद भुला करके आपरेशन ग्रीन हंट को सफल बनाने की रणनीति बनानी होगी। नक्सलियों पर दोहरा वार करने की जरूरत है। इनके विदेशी सम्पर्कों एवं स्थानीय मददगारों की शिनाख्त होनी चाहिए व इसे कमजोर किया जाना चाहिए। दूसरे भ्रष्टाचार, गैर बराबरी, ऊंच-नीच, जातीय दमन, गरीबी व बेरोजगारी आदि जिन कारणों से नक्सलवाद जड़ें जमाता है उनको भी दूर किये जाने की जरूरत है। नक्सलवादी यदि बातचीत की पेशकश लगातार ठुकरा करके एक पर एक बड़े हमले कर रहे हैं तो यह जानना जरूरी है कि आखिरी वे ऐसा किसकी शह पर कर रहे हैं। माओवादी हिंसा का रास्ता नहीं त्याग रहे हैं। इसका मतलब है कि सरकार मानती है कि नक्सलियों पर लगाम कसना उसके लिए कठिन चुनौती है। हालांकि गृहमंत्री पी. चिदंबरम सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि अगर नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ दें तो माओवादियों से सरकार बातचीत कर सकती है। गृहमंत्री की अपील का जवाब माओवादियों ने सुरक्षाबलों के ७६ जवानों को दांतेवाड़ा में शहीद करके दिया। नक्सली समस्या पर चिंतित सुप्रीम कोर्ट का भी कहना है कि यह समस्या विशुद्ध रूप से सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई है। इसका समाधान सामाजिक असामानता दूर करके ही किया जा सकता है। बहरहाल बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल तक की पूरी पट्टी नक्सलवाद के जाल में बुरी तरह फंसी हुई है, जहां निरंतर निर्मम हत्याएं व सरकारी संपत्तियों की लूटपाट चल रही है। माओवादी निर्भीकता और स्वतंत्रता के साथ अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं और देश के अधिकांश राज्य इसकी चपेट में आ चुके हैं। वे सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को अगवा करते हैं। बदले में अपनी मांगे मनवाते हैं अन्यथा समय सीमा समाप्त होने पर अपहृत व्यक्ति की हत्या करके फेंक देते हैं। वे सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं। जवानों को मारते हैं। उनके हथियार छीन लेते हैं। वे ग्रामीणों की सामूहिक व निर्मम हत्या करते है। उनके घरों में आग लगा देते हैं। हत्याओं के लिए जघन्य तरीके अपनाते है। पुलिस जवानों की निर्मम हत्याओं के बावजूद सरकार अब तक कुछ खास कार्रवाई नहीं कर पाई। नक्सलवादियों के ऐसे कृत्यों से सुरक्षाबलों का मनोबल गिर रहा है और समाज में अशांति उत्पन्न हो रही है। चिदंबरम के आपरेशन ग्रीन हंट के सामने नक्सलियों का रेड हंट भारी है। चिदंबरम की समूची रणनीति को नक्सलियों ने विफल कर दिया है। नक्सलियों ने उनके ग्रीन हंट को ठेंगा दिखाते हुए ताबड़तोड़ कई बड़ी वारदातें कीं। नक्सलवाद समग्र आर्थिक और सामाजिक समस्या है, जिसकी शुरुआत चालीस साल पहले भारत में हुई थी। पिछले पांच सालों में नक्सलियों ने अपने प्रभाव क्षेत्र को पचास प्रतिशत तक बढ़ा लिया है। इतनी तेजी से नक्सलियों का प्रभाव कैसे बढ़ा यह शोध का विषय हो सकता है। देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या बढ़ी है। गरीब बढ़ रहे हैं। अमीर भी बढ़ रहे हैं। अब भुखमरी की स्थिति में लोग क्या करें। या तो भीख मांगेंगे या नक्सलियों की शरण में जाएंगे। नक्सली हर गुरिल्ला को तीन हजार रुपये मासिक वेतन दे रहे हैं। साथ ही वसूली का हिस्सा भी। दूसरी तरफ सरकार अगर अपने पुलिस बल में या अन्य नौकरियों में किसी को रखती है तो घूस के तौर पर दो लाख से पांच लाख रुपये तक मांगा जाता है। झारखंड, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों में भर्ती में जो भ्रष्टाचार है, वह किसी से छिपा नहीं है। नक्सलियों की जमीन को विस्तार देने में तो सरकार की खुद की आर्थिक नीतियां दोषी रही हैं। आदिवासी संसाधनों की लूट अगर नहीं रुकी तो नक्सलवादी जमीन कमजोर नहीं होगी बल्कि उसका विस्तार ही होगा। हर राज्य सरकार खाद्यान्नों की लूट में लगी है। इनके माफिया और कारपोरेट मिल जुलकर खादान्नों को लूट रहें है। नक्सलियों से बातचीत करने का अब तक कोई फायदा नहीं निकला। वे बातचीत को भी अपने फायदे में इस्तेमाल करने की सोचते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का नक्सलियों के प्रति साफ्ट कार्नर है। जब केंद्र नक्सलियों पर लगाम कसना चाहता है और पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार का सहयोग करना चाहता है तो ममता बनर्जी नाराज हो जाती हैं। बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार व झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का स्टैण्ड भी इस मुद्दे पर साफ नहीं है। न ही आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व उड़ीसा के मुख्यमंत्रियों का। बुजुर्ग साहित्यकार महाश्र्वेता देवी ने नक्सली समस्या के हल के लिए मध्यस्थता की रजामंदी तो जताई लेकिन किशन पटनायक सरीखे नेताओं ने बातचीत का रास्ता नकारते हुए २०५० तक भारतीय गणतंत्र को ही मटियामेट करने की चेतावनी दे डाली। वे अपनी हिंसक रणनीति को भी जारी रखे हुए हैं। छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले में माओवादियों की खूनी कार्रवाई से एक बार फिर सरकार के नक्सल विरोधी अभियान पर सवालिया निशान लग गया है। केंद्र सरकार ने जब से यह अभियान शुरू किया है माओवादियों के हमले और बढ़ गए हैं। एक तरफ खूनी खेल चल रहा है तो दूसरी तरफ सियासी खेल। सवाल यह भी है कि क्या राज्य सरकारें मन से नक्सल विरोधी अभियान में केंद्र सरकार के साथ हैं। केंद्र के रवैये को लेकर उनके भीतर गहरा संशय बना हुआ है। जब केंद्र उनसे कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की बात कहता है तो वे उसे आक्षेप की तरह लेती हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करके केंद्र आम आदमी के भीतर उनकी गलत छवि बनाकर उसका राजनीतिक फायदा उठाना चाहता है। मसलन पश्चिम बंगाल को ही लें। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम जब राज्य के कानून व व्यवस्था का मुद्दा उठाते हैं या इस मामले में कोई सलाह देते हैं तो बुद्धदेव भट्टाचार्य को लगता है कि चिदंबरम अपने सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस की भाषा बोल रहे हैं। कई राज्यों की सरकारों ने अपने तरीके से माओवादियों से निपटने की कोशिश तो की लेकिन उन सरकारों ने चुनाव में माओवादियों से लाभ भी लिए। ऐसी सरकारें अभी भी उनसे सीधे टकराव से बचना चाहती हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री ने हाल में कुछ ऐसा ही संकेत दिया था। राज्यों और केंद्र के बीच द्वंद्व का फायदा नक्सलियों ने शुरू से ही उठाया और लगातार अपना विस्तार किया। वे सरकार की दुविधा को समझते हैं। इसलिए बीच-बीच में बातचीत की पेशकश पर सकारात्मक रुख अपनाने का स्वांग रचते हैं। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस तरह का रक्तपात मचाया, वह बेहद निंदनीय है। दांतेवाड़ा के जंगलों में सीआरपीएफ व राज्य पुलिस के गश्ती दलों पर घात लगाकर नक्सलियों ने हमले किए, जिसमें ७५ जवान शहीद हुए। गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने इसकी कड़ी निंदा करने की औपचारिकता निभा ली है और सुरक्षा बलों की रणनीतिक चूक को इसका कारण बताया है। केंद्रीय गृहमंत्री को रणनीतिक चूक जैसे बयान देने के बजाय वास्तविकता से जनता को अवगत कराना चाहिए। पश्चिम बंगाल के लालगढ़ के दौरे के मौके पर उन्होंने मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य को नक्सलवाद से निबटने की नसीहत दी। इस नसीहत से उपजा बवाल अभी शांत नहीं हुआ था कि अब यह रणनीतिक चूक का मसला सामने है। नक्सलवाद को सरकार आतंकवाद की तरह गंभीर मुद्दा मानती है और ऐसा है भी। जाहिर है इसके खिलाफ रणनीति भी उतनी ही गंभीरता से बनाई जाती होगी, जितनी बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए। तब रणनीतिक चूक की बात बहुत हल्के किस्म की लगती है। देश के कई रक्षा विशेषज्ञ, पुलिस, खुफिया विभाग के श्रेष्ठ अफसर नक्सलियों के खिलाफ रणनीति बनाते हैं, अगर इसमें कमी रहती है तो यह बेहद गंभीर बात है। राजनीतिक व प्रशासनिक स्तर पर जरूरत से ज्यादा बयानबाजी भी इस समस्या को उलझा रही है।
फिर धड़कने की तैयारी
6ब्बीस साल से बंद लखनऊ के हुसैनाबाद घंटाघर की घड़ी फिर से टिक-टिक करने वाली है। कोशिश चल रही है कि देश के सबसे ऊंचे घंटाघर को फिर से नया लुक दिया जाए। संयुक्त प्रांत ( तब उत्तर प्रदेश का यही नाम था) के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जार्ज कोपर के सम्मान में हुसैनाबाद ट्रस्ट ने १८८२ से १८८७ के बीच इसका निर्माण कराया। ब्रिटिश आर्किटेक्ट रिचर्ड रासकेल बेयन ने रिष स्टाइल में इसे डिजाइन किया था। इसमें जो घड़ी लगी है वह तकनीकी दृष्टि से विश्र्व की तीन नायाब घड़ियों में से एक मानी जाती है। यह घड़ी कितनी कीमती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि घंटाघर के पूरे भवन के निर्माण पर जब नब्बे हजार रुपये खर्च हुए थे तब इसमें लगायी गयी घड़ी की कीमत २६ हजार ९ सौ ३३ रुपये थी। गन मेटल से निर्मित इस घड़ी में पांच बड़े घंटे लगे हैं, जिनकी आवाज तीन किलोमीटर दूर तक सुनायी पड़ती थी।हुसैनाबाद घंटाघर की घड़ी १९८४ तक लगातार चलती रही। १९८४ में यह खराब हो गयी। ब्रिटेन की फर्म जे.डब्ल्यू बेंसन द्वारा निर्मित इस घड़ी को स्केपमेंट और पेंडुलम के जरिये इस तरह से संबद्ध किया गया था कि यह पच्चानवे साल तक लगातार चलती रही। इस घड़ी के खराब होने के बाद इसे ठीक करने के प्रयास हुए। कोई ऐसा कारीगर नहीं मिला जो इसे ठीक कर पाता। १९९९ से २००३ तक कारीगर तलाशने के बाद बरेली की फर्म शब्बन एंड संस ने इसे ठीक कर देने का ठेका लिया। फर्म ने इस एवज में नौ लाख रुपये मांगे। बरेली की इस फर्म को ढाई लाख रुपये एडवांस भी दिए गये लेकिन वह इस घड़ी को ठीक नहीं कर पायी। इसी बीच घड़ी का दिल माना जाने वाला पुर्जा स्केपमेंट कहीं खो गया। इसके बाद हुसैनाबाद ट्रस्ट ने कोलकाता की एंग्लो रिक्श वाच कंपनी सहित कई विशेषज्ञ फर्मों और विशेषज्ञों से घड़ी को दोबारा चालू करने पर विचार विमर्श किया। कोई भी इस बात पर एकमत नहीं हो पाया कि यह घड़ी फिर से चल पाएगी या नहीं। लखनऊ की शान माने जाने वाले हुसैनाबाद के ऐतिहासिक घंटाघर की घड़ी को ठीक करने में जब विशेषज्ञों ने हाथ खड़े कर दिए तब आईआईटी कानपुर के बीटेक मैकेनिकल अखिलेश अग्रवाल और मर्चेंट नेवी में सेवारत कैप्टन परितोष चौहान ने इसे ठीक करने का बीड़ा उठाया। इन्होंने घड़ी के मूल दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद गन मेटल से ही घड़ी के खो चुके स्केपमेंट को फिर से तैयार कर लिया। स्केपमेंट तैयार हो जाने के बाद अब यह दिक्कत सामने है कि कोई यह बताने वाला भी नहीं है कि वह स्केपमेंट घड़ी में लगाकर उसे चलाने का रिस्क लिया जाए या नहीं। हुसैनाबाद ट्रस्ट अब इस स्केपमेंट का वीडियो तैयार करवाकर ब्रिटिश आर्कियोलाजिकल सोसायटी को भेज रहा है ताकि वहां से विशेषज्ञों की राय ली जा सके। लखनऊ के अपर जिलाधिकारी और हुसैनाबाद ट्रस्ट के सचिव ओम प्रकाश पाठक ने बताया कि लखनऊ में तैयार किए गए स्केपमेंट के वीडियो को अगर ब्रिटेन के विशेषज्ञों से हरी झंडी मिल जाती है तो इसकी मरम्मत का काम शुरू कर दिया जाएगा। घड़ी की मरम्मत के काम में पंद्रह लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। हुसैनाबाद ट्रस्ट ने घड़ी ठीक हो जाने की संभावना के बाद घंटाघर में आयी दरारें और जीर्ण शीर्ण हो चुकी उसकी सीढ़ियों की मरम्मत का फैसला भी कर लिया है। पीडब्ल्यूडी के रिटायर्ड प्रमुख अभियंता वी.के. श्रोतिया घंटाघर की मरम्मत में तकनीकी सलाह देंगे। घंटाघर की सीढ़ियों और इसकी दरारों को ठीक करने में तीन लाख रुपये का खर्च आएगा। घंटाघर को फिर से उसके पुराने स्वरूप में लौटाने पर खर्च होने वाले १८ लाख रुपये का व्यय हुसैनाबाद ट्रस्ट वहन करेगा। बीस फुट चौड़ाई और बीस फुट लंबाई के वर्ग पर निर्मित किए गए हुसैनाबाद घंटाघर की ऊंचाई २१२ फुट है। घंटाघर के शीर्ष पर पीपल का बगुला लगाया गया है, जो हवा की दिशा बताता है। ऐतिहासिक आसिफी इमामबाड़े और छोटे इमामबाड़े के बीच स्थित घंटाघर पर्यटकों के खास आकर्षण का केंद्र है।
आसान नहीं डगर
योग गुरु बाबा रामदेव ने भी राजनीति में प्रवेश की घोषणा कर दी है। उन्होंने अपनी पार्टी का नामकरण भी कर लिया है। उनकी पार्टी होगी भारत स्वाभिमान पार्टी। ऐसे में सहज सवाल उठता है कि क्या वे राजनीति में सफल हो पाएंगे या फिर अन्य बाबाओं की तरह उनका भी हाल होगा। बाबा रामदेव एक सफल योग गुरु हैं। वे हरियाणा में १९५३ में पैदा हुए। लकवा से पीड़ित होकर वे योग की ओर आगे बढ़े। योग द्वारा उनके लकवे का इलाज हो रहा था। वे उससे मुक्त भी हो गए। इसी दौरान वे इस विद्या में पारंगत हो गए फिर उन्होंने लोगों को मुफ्त योग सिखाना शुरू कर दिया। योग का प्रचार करते-करते और लोगों को बीमारियों से मुक्ति दिलाने की पहल के साथ ही उन्होंने भारी प्रसिद्धि हासिल कर ली। इस प्रसिद्धि का कारण उनके द्वारा अपने योग प्रचार में टीवी चैनलों का इस्तेमाल था। आयुर्वेद की दवाओं और घरेलू नुस्खों का योग के साथ साथ प्रचार करके बाबा रामदेव करोड़ों लोगों के बीच में परिचित चेहरा बन गए। यदि उन्हें लगता है कि वे पूरे देश में इतने ज्यादा प्रचारित हो गए हैं कि अगर अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ते हैं तो भारी सफलता हासिल होगी। वे राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप चाहते थे इसलिए अपने योग शिविरों में उन्होंने राजनीतिज्ञों को आने का मौका दिया। नेताओं के पास लंबे चौड़े निमंत्रण पत्र भेजकर उन्हें बुलाया जाता। सहारा समूह से नजदीकी के बाद वे लालू व मुलायम के प्रभाव में आये। लालू ने तो समय-समय पर बाबा रामदेव का जमकर नगाड़ा बजाया फिर भी बाबा की बेचैनी बनी रही। इसलिए पिछले आम चुनाव से ठीक पहले उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की शुरुआत कर दी। योजना तो सीधे चुनाव मैदान में उतरने की थी लेकिन कम समय के कारण तैयारी नहीं हो पायी। जोधपुर में आयोजित सभा में उन्होंने स्वीकार भी किया था कि तैयारी अधूरी थी। उनका एक ही संदेश है कि सदस्य बनाइये और प्रशिक्षण दीजिए। लक्ष्य है कि दो करोड़ सक्रिय सदस्य बन जाएं। इसके लिए वे देश में ११ लाख योग कक्षाओं के नियमित आयोजन का आवाहन कर रहे हैं।इन कार्यक्रमों में उनकी हां में हां मिलाने के लिए उपकृत भक्तों का हुजूम भी दिख रहा है। बाबा उत्साहित हैं। उनका उत्साह छिपाये नहीं छिप रहा। वे कहते हैं कि कोई समय सीमा तो नहीं है लेकिन उनका राजनीतिक आधार अगले दो साल में तैयार हो जाएगा। यानी, २०१४ के चुनाव में बाबा रामदेव भी अपने प्रत्याशी मैदान में उतारेंगे। फिलहाल उनकी इस घोषणा से तो यही लगता है कि वह वही गलती कर रहे हैं जो करपात्री जी महराज ने सालों पहले की थी। जिन राजनीतिज्ञों को हटाने के लिए बाबा रामदेव घूम-घूम कर प्रवचन दे रहे हैं, उन्हीं राजनीतिज्ञों की बदौलत वे अब तक अपने योग शिविरों को चमकाते रहे हैं। राजनीतिज्ञों को यह अहसास होते देर नहीं लगेगा कि बाबा अब उनके क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। ऐसे में वे उनके साथ क्या व्यवहार करेंगे यह तो आने वाला समय बताएगा। प्राणायाम के चमत्कार में बाबा रामदेव के प्रभाव में आये सामान्य जन उनका राजनैतिक संदेश भी मानेंगे इसकी क्या गारंटी है। बाबा रामदेव के आज करोड़ों प्रशंसक हैं। उनके अनुयायियों की संख्या भी लाखों में हैं। उनका अपना योग और आयुर्वेद का साम्राज्य है जो अरबों रूपये का है। उनका यह साम्राज्य दिनों दिन फैलता जा रहा है। ६००० लोगों को तो उन्होंने अपने उद्योग में सीधे-सीधे नौकरी दे रखी है। उनके व्यापारिक साम्राज्य से रोजगार के अन्य अवसर भी पैदा हुए हैं। वे करपात्री महाराज से अच्छी स्थिति में हैं, जिन्होंने राम राज्य परिषद बनाकर राजनीति में प्रवेश किया था। वे धीरेन्द्र ब्रह्मचारी से भी बेहतर स्थिति में हैं, जिनकी राजनीति श्रीमती इंदिरा गांधी पर निर्भर थी। उनकी अपील किसी विशेष संप्रदाय अथवा जाति तक सीमित नहीं है। वे कोई सांप्रदायिक अथवा जातिवादी मसला उठा भी नहीं रहे। उन्होंने देवबंद के जमात-ए-उलेमा का निमंत्रण स्वीकार कर उनके मंच से हजारो मुस्लिम धार्मिक नेताओं को संबोधित किया और योग पर प्रवचन देकर उनकी वाहवाही हासिल की इसके बावजूद उनकी राजनैतिक यात्रा आसान नहीं है। उन्होंने अपने इर्द-गिर्द जो आभा खड़ी की है, उसके पीछे अनेक मुख्यमंत्रियों और केन्द्र के मंत्रियो से उनकी नजदीकी प्रमुख है। लालू प्रसाद यादव से लेकर नरेंद्र मोदी तक सभी उनके मुरीद हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा से भी उनके अच्छे संबंध हैं।
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