Tuesday, April 13, 2010

सियासत का मुद्दा बने बिग बी

बिग बी भाजपा और कांग्रेस की तकरार का नया मुद्दा बन गए हैं। कांग्रेस जहां एक तरफ गुजरात का ब्रांडअंबेस्डर बनाने पर उनकी आलोचना कर रही है वहीं दूसरी तरफ भाजपा उन्हें एक सच्चा देशभक्त बनाकर कांग्रेस की अलोचना को खारिज कर रही है। बच्चन परिवार अक्सर अखबारों की सुर्खियों में बना रहता है। कभी यह सुर्खियां कुछ विवादों के चलते गहरा जाती हैं तो कभी बासी चर्चाओं में नया मोड़ आ जाता है। नेहरू गांधी परिवार तथा बच्चन परिवार के बीच दूरियां कायम हैं। इस बीच भाजपा अचानक बच्चन परिवार खासकर अमिताभ बच्चन के मान सम्मान को लेकर ज्यादा व्यग्र हो गयी है। गुजरात में नरेंद्र मोदी द्वारा सदी के महानायक और विज्ञापन जगत के बड़े नाम अमिताभ बच्च्न के लिए लाल कालीन बिछाये जाने के बाद ऐसा हो रहा है। उन्हें केरल का ब्रांड एम्बेसडर बनाये जाने के सवाल पर कामरेड आपस में गुत्थम गुत्था हैं।गुजरात का ब्रांड एम्बेसडर बनाये जाने का मसला अभी शांत नहीं हुआ कि अर्थ आवर के मौके पर नई दिल्ली में हुए एक समारोह में अभिषेक बच्चन की वीडियो क्लिपिंग हटा दी गयी। बच्चन परिवार से सपा का हनीमून खत्म हो चुका है। बच्चन परिवार की दुलारी बहू ऐश्र्वर्या राय का भी सितारा कुछ गर्दिश में है। उनके कीमती ब्रांड और फिल्मों में नंबर वन की पोजीशन कैटरीना कैफ झटक रही है। अमिताभ जया की जोड़ी के बाद ऐश अभिषेक की जोड़ी की अपनी अलग पहचान बनी है लेकिन कुल मिला करके बच्चन परिवार के दिन कुछ खास अच्छे नहीं चल रहे हैं। परिवार का हर सदस्य किसी न किसी वजह से अनचाही सुर्खियों से घिर रहा है। मुंबई में सी लिंक के दूसरे चरण के उद्घाटन पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के साथ अमिताभ बच्चन एक मंच पर नजर आए तो विवाद खड़ा हुआ। फिर डब्ल्यू. डब्ल्यू. एफ. द्वारा आयोजित अर्थ आवर का ब्रांड एम्बेसडर होने के बावजूद दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में अभिषेक बच्चन को दूर रखने पर प्रश्न खड़े हुए। गुजरात का ब्रांड एंबेसडर बनाए जाने पर मोदी के साथ नजदीकी के बाद अब कामनवेल्थ गेम के नाम पर भी बच्चन परिवार के साथ राजनीति की जा रही है। भारत कामनवेल्थ खेलों की तैयारी जोर शोर से कर रहा है। इन खेलों के ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर कई जाने माने नाम जोड़े गए हैं मगर बच्चन परिवार को इस सूची से बाहर रखा गया है। अमिताभ बच्चन सरेआम कह चुके हैं कि राजा और रंक के बीच मित्रता संभव नहीं होती। इसके बावजूद बच्चन परिवार व नेहरू गांधी परिवार के बीच कायम दूरियों पर टीका टिप्पणी की जाती है। अमिताभ बच्चन को विभिन्न कंपनियों और कई फिल्म समारोहों ने अपने साथ जोड़ कर ब्रांड एम्बेसडर बनाया है। टीवी चैनलों में वे जनहित के विज्ञापन भी लगातार करते रहते हैं। अगर किसी जीवित भारतीय को दुनिया में सबसे ज्यादा पहचाना जाता है तो उनमें अमिताभ बच्चन एक हैं। अमिताभ बच्चन परिवार जया, अभिषेक व ऐश्र्वर्या की लोकप्रियता को तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि वे कामनवेल्थ खेलों को प्रमोट कर रहे लोगों की सूची में शामिल नहीं हैं लेकिन इस आयोजन को ही इससे प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि मिलती। कामनवेल्थ गेम के ब्रांड एम्बेसडर की सूची में शाहरुख खान का नाम है। उस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। वे भी पूरी दुनिया में लोकप्रिय होने के अलावा राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अनन्य मित्रों में एक हैं। कामनवेल्थ खेलों के प्रमोशन को लेकर दिल्ली सरकार और खुद आयोजन समिति कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। ऐसे में वो खेल और फिल्मी दुनिया की जानी मानी हस्तियों को ब्रांड एम्बेसडर बनाने में जुटी है लेकिन हैरानी की बात यह है कि ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर बच्चन परिवार में से किसी को भी नहीं चुना गया। सदी के सबसे बड़े महानायक अमिताभ बच्चन के साथ जया बच्चन, अभिषेक बच्चन या फिर ऐश्वर्या राय इस लिस्ट में नहीं हैं। जिस सूची में आमिर खान, शाहरुख खान और कैटरीना कैफ का नाम है उसमें बच्चन परिवार के किसी भी सदस्य का नाम नहीं होना चौंकाता है।दिल्ली सरकार ने अपनी उपलब्धियां दर्शाने के लिए ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर अमिताभ बच्चन को चुना था लेकिन अचानक ओमपुरी को अनुबंधित कर दिया गया। देखा जाए तो जब चर्चा का कोई मुद्दा नहीं होता तो बच्चन परिवार बहस के घेरे में आ जाता है। मुलायम सरकार के दौरान अमिताभ बच्चन को उत्तर प्रदेश सरकार के सरकारी विज्ञापनों से जोड़ा गया था। इसका लाभ कम मिला और मखौल ज्यादा उड़ा। अब नरेन्द्र मोदी उन्हें गुजरात सरकार की उपलब्धियों के प्रचार के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।

नई सुबह का सपना

देश के छः से चौदह साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दिये जाने को मौलिक अधिकार बनाया जाना सचमुच नई सुबह का सपना है। यह फैसला तो देश की आजादी के साथ ही ले लिये जाने की जरूरत थी लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने में तकरीबन छः दशक का वक्त लग गया। मनमोहन सिंह सरकार और संप्रग अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने यह महत्वपूर्ण पहल की। इस अभियान की महत्ता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इसकी शुरुआत करते हुए राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने समाज के सभी वर्गों से इस दिशा में समुचित योगदान देने का आह्वन किया। मनमोहन सिंह ने संबोधन के दौरान उन कठिनाइयों का जिक्र किया जो उन्होंने अपने बचपन में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान उठाई थीं। वे यह बात बताना भी नहीं भूले कि आज वे जो भी हैं शिक्षा की बदौलत हैं। शिक्षा के महत्व को भारतीय समाज ने शुरू से ही स्वीकार किया है। एक मोटे आंकलन के अनुसार देश में छः से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के एक करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं। यह एक बड़ी संख्या है और महत्वपूर्ण चुनौती भी। इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि स्कूल न जाने वालों अथवा बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों की भारी तादाद है। इतनी बड़ी तादाद में बच्चों को शिक्षित करने के लिए तकरीबन १.७१ लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इसमें ५५ प्रतिशत धनराशि केंद्र सरकार और ४५ प्रतिशत धनराशि राज्य सरकारों को खर्च करनी होगी। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय का दावा है कि देश में छः से चौदह साल की आयु के बच्चों की तादाद २२ करोड़ के आस-पास है, जिनमें करीब एक करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो अपनी सामाजिक आर्थिक स्थितियों के चलते स्कूल नहीं जा पाते। बहरहाल प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के इस आश्र्वासन पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं है कि सभी बच्चों को शिक्षित करने में धन की कमी आड़े नहीं आने दी जायेगी, इसमें पर्याप्त संदेह है कि राज्य सरकारें अपने हिस्से के धन का प्रबंधन कर पायेंगी। यदि किसी तरह धन का प्रबंध हो भी जाए तो भी यह आवश्यक नहीं कि राज्य सरकारें स्कूलों,शिक्षकों और अन्य संसाधनों की कमी दूर करने में भी तत्परता दिखायेंगी। वैसे भी धन की कमी अथवा उपलब्धता किसी कार्य के संपन्न होने की गारंटी नहीं है। इसका एक बड़ा प्रमाण सर्व शिक्षा अभियान है, जो दस्तावेजों में जितना सफल है यथार्थ के धरातल पर उतना ही असफल। सर्व शिक्षा अभियान और इससे पूर्व माध्याहृ भोजन योजना (मिड डे मील), आपेरशन ब्लैक बोर्ड व नयी शिक्षा नीति (१९८५) समय से व प्रभावी ढंग से लागू हो गयी होती तो आज शिक्षा का अधिकार अधिनियम २००९ को लागू करने के लिए इतनी अधिक चिंता करने की जरूरत न पड़ती। शिक्षा पर आज भी न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें दस प्रतिशत बजट राशि का व्यय नहीं करती हैं। प्राथमिक शिक्षा हो, माध्यमिक शिक्षा अथवा उच्च शिक्षा सबका बुरा हाल है। एक ओर सुविधाओं से वंचित हजारों प्राथमिक विद्यालय हैं जिनमें न तो अध्यापक आते हैं और न ही मिड डे मिल दिये जाने के बावजूद छात्र पढ़ाई के लिए टिकते हैं तो दूसरी ओर पंच सितारा होटलों की शानो शौकत और भव्यता को मात देते इंटरनेशनल स्कूल व पब्लिक स्कूल हैं, जिनमें दाखले के लिए अभिभावक कुछ भी करने को तैयार हैं। इतनी विसंगतियों, अलग-अलग पाठ्यक्रमों, नित नये बदलावों के बीच सबको शिक्षा जहां समाज का आदर्श सपना है, वहीं राज्य सरकारों के लिए बोझ भी। देश के सभी राज्यों में स्वास्थ्य की तरह शिक्ष्ाा का भी भरपूर निजीकरण हो चुका है और जो जितना निवेश कर सकने की स्थिति में है उसे उतनी ही बेहतर शिक्षा मिल पा रही है। ऐसे में यदि मनमोहन सरकार ने जरूरतमंद वंचित तबकों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा को संवैधानिक दायरे में बांधते हुए इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दिये जाने की पहल की है तो यह स्वागतयोग्य कदम है।यह सही है कि केंद्र सरकार को शिक्षा का अधिकार कानून २००९ के अमल में बाधा बनने वाली चुनौतियों का आभास है लेकिन राज्य सरकारों का रवैय्या निराश करने वाला है। पश्चिम बंगाल सरकार इसका विरोध कर रही है। उत्तर प्रदेश में यह कानून बीते एक अप्रैल से राज्य भर में लागू तो हो गया लेकिन अभी तक राज्य सरकार ने इस संबंध में कोई महत्वपूर्ण घोषणा नहीं की है। एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पांच लाख प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत होगी, जबकि प्रदेश भर में कुल दो लाख शिक्षक ही हैं। केंद्र सरकार ने इस मद में अपने अंश की घोषणा नहीं की है, न ही राज्य सरकार ने कोई धनराशि मुहैया करायी है। बगैर आर्थिक संसाधनों के यह योजना कैसे प्रदेश भर में लागू की जायेगी यह बात अभी भी समझ से परे है। बहरहाल केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल का दावा है कि छः से चौदह वर्ष के बीच की उम्र के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने का अधिकार मिल जाने से इस वर्ग को शिक्षा हासिल करके अपनी और अपने परिवार की गरीबी दूर करने तथा विकास की मुख्य धारा में शामिल हो पाने का नया अवसर मिलेगा। सिब्बल के इस दावे को सच करके दिखाने की दिशा में उनका विभाग और विभिन्न राज्य सरकारें किस प्रकार रणनीति तय करेंगी और उसे अमल में लायेंगी यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। इस बीच उन तल्ख सच्चाइयों पर भी ध्यान देना जरूरी है जिनका जिक्र स्वाद कसैला कर सकता है। बच्चों को गांव की दहलीज पर और कस्बों-शहरों व महानगरों में अपनी पहुंच के भीतर गुणवत्तायुक्त व बेहतर शिक्षा मिल जाये इससे बेहतर और क्या हो सकता है। यह काम तभी संभव है जब केंद्र व राज्य सरकारों के साथ-साथ त्रिस्तरीय पंचायतें, स्वयंसेवी संगठन तथा अन्य सभी वर्ग भी अपनी भूमिका जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ निभायें। सच तो यह है कि उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों के दूर दराज और दुर्गम इलाकों में जहां पीने के पानी का इंतजाम नहीं हो सका है और लोग दो जून की रोटी के लिए बच्चों से भी मजदूरी कराने को विवश हैं वहां हर बच्चा शिक्षा के अधिकार को हासिल कर लेने के बावजूद कैसे साक्षर हो सकेगा। भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी व अज्ञानता का अभिशाप तो बना ही रहेगा न। यह दशा तो तभी बदलेगी जब समाज का प्रत्येक वर्ग इसे पूरा करने के लिए ललक के साथ आगे बढ़े। यह एक रुमानी और आदर्श अपना नहीं है बल्कि इक्कीसवीं शताब्दी में देश की सबसे बड़ी जरूरत भी है। बीते साल मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने शिक्षा के अधिकार विधेयक को जब संसद के पटल पर रखा था तो उसकी कुछ खासियतों का खूब जोर शोर से प्रचार प्रसार किया था। अब जबकि संसद की हरी झंडी मिलने के बाद एक अप्रैल से आम जनता के हाथों में यह कानून आ गया तो सवाल यह है कि आम जनता द्वारा इस कानून का फायदा उठाया भी जा सकेगा या नहीं। जो परिवार गरीबी रेखा के नीचे बैठे हैं, उनके भविष्य की उम्मीद शिक्षा पर टिकी है। यह उन्हें स्थायी तौर पर सशक्त भी बना सकती है। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि एक अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में २७.५ प्रतिशत लोग्ा गरीबी रेखा के नीचे हैं। इसी तबके के तकरीबन २० करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। इसलिए भारत में गरीबी और शिक्षा की बिगड़ती स्थितियों को देखते हुए, २००१ में एक संविधान संशोधन हुआ। इसमें यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए राज्य सरकारें और अधिक पैसा खर्च करेगी। मगर हुआ इसके ठीक उल्टा, राज्य सरकारों ने गरीब बच्चों की जवाबदेही से बचने का रास्ता ढ़ूढ़ निकाला और सरकारी स्कूलों को सुधारने की बजाय गरीब बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में २५ आरक्षण देकर नया रास्ता दिखाया। फिलहाल, राज्य सरकारें एक बच्चे पर साल भर में करीब २,५०० रुपए खर्च करती हैं। अब खर्च की यह रकम राज्य सरकार प्राइवेट स्कूलों को देंगी। प्राइवेट स्कूलों की फीस तो साल भर में २,५०० रूपए से बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में यह आशंका पनपती है कि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए अलग से नियम कानून बनाए जा सकते हैं और उनके लिए सस्ते पैकेज वाली व्यवस्थाएं लागू हो सकती हैं। शिक्षा का यह अधिकार केवल छः से चौदह साल तक के बच्चों के लिए है। जबकि हमारा संविधान ६ साल के नीचे के १७ करोड़ बच्चों को भी प्राथमिक शिक्षा, पूर्ण स्वास्थ्य और पोषित भोजन का अधिकार देता चला आ रहा है। ऐसे में कह सकते हैं कि यह कानून शिक्षा के अधिकार के नाम पर संविधान में पहले से दर्ज अधिकारों को काट रहा है। दूसरी तरफ, १५ से १८ साल तक के बच्चों को भी यह कानून जगह नहीं दे रहा है। वैश्विक स्तर पर बचपन की सीमा १८ साल तक रखी गई है, जबकि केंद्र सरकार बचपन को लेकर अलग-अलग परिभाषाओं और आयु वर्गों में विभाजित है। इन सबके बावजूद वह १८ साल तक के बच्चों से काम नहीं करवाने के सिद्धांत पर चलने का दावा करती है मगर जब उस सिद्धांत को कानून या नीति में शामिल करने की बारी आती है तो वह पीछे हट जाती है। अगर कक्षाओं के हिसाब से देखें तो यह अधिकार कम से कम पहली और ज्यादा से ज्यादा आठवीं तक के बच्चों के लिए है। अर्थात जहां यह आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों को छोड़ रहा है, वहीं तमाम बच्चों को तकनीकी और उच्च शिक्षा का मौका भी नहीं दे रहा है। आमतौर से तकनीकी पाठयक्रम बारहवीं के बाद ही शुरू होते हैं मगर यह कानून तो उन्हें केवल साक्षर बनाकर छोड़ देने भर के लिए है। कुल मिला कर शिक्षा के अधिकार का यह कानून न तो सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार देता है, न ही। पूर्ण शिक्षा की गांरटी ही दुनिया का कोई भी देश सरकारी स्कूलों को सहायता दिए बगैर सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य नहीं पा सकता है। विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस अपने राष्ट्रीय बजट का ६७ प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं। अपने देश में ४० करोड़ बच्चों की शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का केवल ३ प्रतिशत ही खर्च किया जाता है। देश की करीब ४० लाख बस्तियों में प्राथमिक स्कूल नहीं हैं। देश के आधे बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। देश भर में १.७ करोड़ बाल मजदूर हैं। हम २०१५ तक स्कूली शिक्षा का लक्ष्य पूरा करने की हालत में नहीं हैं। ऐसे में तो हमारी सरकार को बच्चों की शिक्षा पर और ज्यादा खर्च करना चाहिए मगर वह तो केंद्रीय बजट (२००९-१०) से सर्व शिक्षा अभियान और मिड डे मील जैसी योजनाओं को दरकिनार करने पर तुली है।जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा कमजोर था तब उसने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए। वैसे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उनकी सक्रियता ने बुरी तरह से उपेक्षित शिक्षा के एजेंडे को राष्ट्रव्यापी बहस के केंद्र में ला दिया है। उनके कई ताजा प्रस्तावों में शिक्षा को लेकर आधुनिक दृष्टि और समझ भी दिखती है। स्कूली बच्चों की पढ़ाई को अंकों के दबाव से मुक्त रखने की बात हो या नर्सरी में दाखले की न्यूनतम उम्र तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष करने का सुझाव, या फिर दसवीं और बारहवीं में गणित और विज्ञान की पढ़ाई एक करने का इरादा इन सबमें वह जरूरी संवेदनशीलता है जिसकी कमी अरसे से महसूस की जा रही थी। यद्यपि चुनौतियां कहीं ज्यादा गहरी हैं। उसके सवाल कहीं ज्यादा नुकीले हैं। चाहे प्राथमिक स्तर की शिक्षा हो या उच्च शिक्षा एक बहु परतीय गैर बराबरी के अलावा डरावनी अराजकता से लेकर भ्रष्टाचार तक हमारी शिक्षा व्यवस्था के लगभग स्वीकार्य अंग बन चुके हैं। आलम यह है कि बच्चे का स्कूल तय होते ही तय हो जाता है कि वह भविष्य में क्या बनेगा। अगर वह ठेठ सरकारी स्कूलों में जा रहा है तो उसकी पढ़ाई बीच में छूट जाएगी या किसी तरह दसवीं बारहवीं पास करके वह चपरासी या इसके आसपास के कुछ पदों की शोभा बढ़ाएगा। अगर वह साधारण स्कूलों में पढ़ता है तो क्लर्क से लेकर अफसर तक की नौकरी में कहीं खप जाएगा। अगर वह महंगे पब्लिक स्कूलों का छात्र है तो अभिजात्य संस्थानों का महत्वाकांक्षी छात्र और भविष्य का आला अफसर या मैनेजर होगा। अगर वह सबसे ऊंचे स्कूलों में पढ़ता है या विदेश में पढ़ाई करके लौटता है तो इस देश पर राज करेगा। वैसे इस नियम के अपवाद भी हैं। कहा जाता है कि इस देश ने असंख्या गुदड़ी के लाल भी पैदा किये हैं जिन्होंने अभावों से लड़ कर बेशुमार उपलब्धि हासिल की है। जब कपिल सिब्बल दसवीं और बारहवीं के पाठ्यक्रम को एक करके सबको बराबरी के मौके देने की बात करते हैं तो लगता है कि यह चांद पर जाने के लिए सीढ़ी बनाने का काम है। शिक्षा की असमानताएं पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं हैं बल्कि पाठ्यक्रम में वे सबसे कम और सबसे देर से दिखती हैं। सबसे ज्यादा वे उस बुनियादी ढांचे में हैं, जो इस देश में शिक्षा के तंत्र को नियंत्रित करता है। कहा जा सकता है कि जो सामाजिक गैर बराबरी है, वही स्कूली गैर बराबरी में भी झांकती है। शिक्षा को लेकर बढ़ते उपयोगितावादी नजरिये ने अनजाने में इसे उसी जड़ता के कुएं में धकेल दिया है जिससे बाहर आने की कोशिश में न जाने कितने वर्ष खर्च किये गये। हालत यह है कि जो सबसे अच्छे छात्र हैं, जिन्हें सबसे अच्छी पढ़ाई हासिल हुई है, वे अपने अध्ययन का सबसे कम इस्तेमाल कर पाते हैं। अकसर हम पाते हैं कि किसी खास अनुशासन में आईआईटी करने के बाद लड़के आईआईएम कर लेते हैं और वहां से टाप करके सबसे ऊंची सैलरी देने वाली किसी फर्म में साबुन से लेकर शीतल पेय तक बेचने के काम में जुट जाते हैं। हाल के दिनों में सूचना प्रौद्योगिकी का जो हल्ला मचा, उसमें कई भारतीय युवकों ने अमेरिका जाकर अच्छा काम किया लेकिन वह काम भी सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कुछ उपयोगी सॉफ्टवेयर बनाने से आगे जाता नजर नहीं आ रहा। जैसे-जैसे शिक्षा का ढांचा मजबूत और बड़ा होता गया, कुछ कुशल पेशेवर इंजीनियर और रट्टामार अफसर निकालने तक सीमित रह गई। आमिर खान की फिल्म 'थ्री इडियट्स' इसी प्रवृत्ति पर अपने अंदाज में चोट करती है।

Saturday, March 27, 2010

... फैसला

गरीब और पिछड़े मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों के आरक्षण के बारे में अंतरिम आदेश देकर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आंध्रप्रदेश सरकार के फैसले पर मंजूरी की मुहर लगा दी। एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को बहाल कर दिया है जिसे आन्ध्र प्रदेश सरकार ने इस उद्देश्य से बनाया था कि सरकारी नौकरियों में पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण दिया जा सकेगा। बाद में हाई कोर्ट ने इस कानून को रद्द कर दिया था। अब हाई कोर्ट के फैसले को गलत बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे कानूनी शक्ल दे दी है। पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ मुसलमान होने की वजह से कोई आरक्षण का हकदार हो जाता है, लेकिन यहां पर यह इसलिए ठीक है कि अगर वह सामाजिक रूप से पिछड़ा या दलित की श्रेणी में आता है तो उसे भी शिक्षा और नौकरियों में ठीक उसी तरह आरक्षण मिलना चाहिए, जिस तरह उसके जैसी सामाजिक स्थिति वाले अन्य धर्मों के भाइयों को मिलता है। फिलहाल मामला संविधान बेंच को भेज दिया गया है जहां इस बात की भी पक्की जांच होगी कि आन्ध्र प्रदेश सरकार का कानून विधिसम्मत है कि नहीं। संविधान बेंच से पास हो जाने के बाद मुस्लिम आरक्षण के सवाल पर कोई वैधानिक अड़चन नहीं रह जायेगी। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए कुछ सीटें रि.जर्व करने का कानून बनाने की दिशा में सकारात्मक पहल की है। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में मुसलमानों को १० प्रतिशत रिजर्वेशन देने की पेशकश की थी। उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। अब इस फैसले के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य को अपने फैसले को लागू करने के लिए ताकत मिलेगी। इसके पहले भी केरल, बिहार, कर्नाटक और तमिलनाडु में पिछड़े मुसलमानों को रि.जर्वेशन की सुविधा उपलब्ध है। देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी उत्तर प्रदेश में है लेकिन राज्य में अभी पिछड़े मुसलमानों के लिए किसी तरह का आरक्षण नहीं है। उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां आज भी उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दल इस वोट बैंक पर अपना दावा ठोंकते रहते हैं। इसी आधार पर यह दल अपनी राजनीतिक रोटी तो सेंकते हैं पर इनके हितो से इनका कोई भी लेना देना नहीं रहता। क्योंकि अगर हित साध देंगे तो इनकी राजनीति ही बंद हो जाएगी। अपनी राजनीति की दुकान चलाने के लिए यही वोट बैंक इन्हें सबसे मुफीद लगता है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद केंद्र की यूपीए सरकार पर भी रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का दबाव बढ़ जाएगा। कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में वायदा किया था कि सरकार बनने पर मुसलमानों के लिए ओ बी सी के लिए रिजर्व नौकरियों के कोटे में मुस्लिम पिछड़ों के लिए सब कोटा का इंतजाम किया जाएगा। अब कांग्रेस से सवाल पूछने का समय आ गया कि वे अपने वायदे कब पूरे करने वाले हैं। वैसे संविधान लागू होने के ६० साल बाद एक बार फिर ऐसा माहौल बना है कि राजनीतिक पार्टियां अगर चाहें तो सकारात्मक पहल कर सकती हैं और गरीब और पिछड़े मुसलमानों का वह हक उन्हें दे सकती हैं।

Friday, March 26, 2010

फिर विवादों में बिग बी

बिग बी का विवादों से पुराना नाता रहा है बोफोर्स घोटाले से लेकर आज तक बिग बी किसी न किसी विवाद के चलते सुर्खियों में बने रहते हैं। बांद्रा वर्ली सी लिंक के उद्घाटन के अवसर पर उनकी उपस्थिति ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया। कांग्रेस पार्टी को बिग बी की उपस्थिति काफी नागवार गुजरी है। मुंबई महानगर कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह ने बिग बी के साथ मंच पर जाने से यह कह कर इंकार कर दिया कि बिग बी गुजरात सरकार के ब्रांड एंबेसडर हैं। नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थन करते हैं। इसलिए उनके साथ मंच पर उपस्थित होना संभव नहीं है।कांग्रेस के इस विरोध पर मुख्यमंत्री अशोक चहवाण को भी सफाई देनी पड़ी है। श्री चहवाण ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने इस कार्यक्रम में बिग बी को आमंत्रित नहीं किया था। वहीं दूसरी तरफ बिग बी ने सफाई दी है कि वे महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री के बुलावे पर इस समारोह में शामिल हुए थे। सूत्रों के अनुसार इस प्रकरण को कांग्रेस एनसीपी के आपसी संबंधों के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों की मानें तो अमिताभ बच्चन को एनसीपी कोटे के मंत्री ने कार्यक्रम में आमंत्रित किया था। एनसीपी ने यह कदम किसी राजनीतिक कूटनीति के तहत ही उठाया था ताकि कांग्रेस को नीचा दिखा सके। एनसीपी के इस कदम से यह भी समझा जा रहा है कि कांग्रेस और एनसीपी के संबंधों में दरार पड़ना प्रारंभ हो गयी है। दोनों ही दल भाजपा और शिवसेना को सत्ता से दूर रखने के लिए भले ही एकजुट हुए हों लेकिन दोनों ही सरकार में रहकर अपना-अपना एजेंडा लागू करना चाहते हैं। एनसीपी ने अमिताभ बच्चन को भी अपनी उसी कूटनीति के तहत कार्यक्रम स्थल पर आमंत्रित किया था। सपा के निष्कासित नेता अमर सिंह की बच्चन से नजदीकियां जगजाहिर हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार व अमर सिंह के रिश्तों में घनिष्ठता बढ़ी है। इसी घनिष्ठता को और प्रगाढ़ करने के लिए शरद पवार के इशारे पर उनके कोटे के मंत्री ने अमिताभ को आमंत्रित किया था। अमिताभ बच्चन को आमंत्रित करके एनसीपी ने कांग्रेस को भी यह संकेत देने का प्रयास किया है कि वह अपने सिद्धांतों और नीतियों पर ही राजनीति करेंगे और कांग्रेस के इशारों पर नहीं चलेंगे। सनद रहे कि कभी बच्चन परिवार नेहरू गांधी परिवार का चाहने वाला रहा है। बीच के दिनों में पता नहीं किस बात पर गांधी और बच्चन परिवार के बीच खटास पैदा हुई और इसके चलते अमर सिंह जैसे लोगों ने सोनिया परिवार की वाचिक छंटाई शुरू कर दी। अब जब बच्चन पर भी सीधा हमला बोल दिया गया है तो हर संकट में बच्चन के लिए खुद को कुर्बान करने की कसम खाने वाले छोटके भैया अमर सिंह की इस मामले में बोलती बंद है। अमिताभ बच्चन को लेकर सोनिया गांधी कितनी सख्त हैं, यह तो तब ही पता चलेगा जब वे या उनका परिवार कुछ बोले। देखा जाए तो यह एक ऐसा मौका था जब मुंबई के दो हिस्से ही नहीं जुड़ते बल्कि गांधी बच्चन परिवार के संबंधों में भी एक नया सेतु निर्मित होता लेकिन ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी की राजनीतिक मंडली किसी भी कीमत पर ऐसा कोई सेतु निर्मित नहीं होने देना चाहती। फिर चाहे सोनिया गांधी की रजामंदी हो या न हो।हालांकि मीडिया में चर्चा सिर्फ इस बात की हो रही है कि अमिताभ बच्चन का अपमान कांग्रेस क्यों कर रही है। लेकिन इस बात की तरफ शायद जान बूझ कर लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं कि अचानक अमिताभ बच्चन को कांग्रेस एनसीपी की सरकार में एक ऐसे सी लिंक के उद्घाटन में बुलाने की वजह क्या हो सकती है जिसका शुरुआती उद्घाटन खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमिताभ बच्चन छोटे भ्ौया अमर सिंह के लिए एनसीपी में राजनीतिक लिंक खोलने जा रहे हैं? वैसे, जब अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दिया था तभी इस बात की चर्चा जोरशोर से उठी थी कि अमर सिंह एनसीपी में जा सकते हैं लेकिन अमर सिंह और एनसीपी शायद आपसी तालमेल के लिए तैयार नहीं हो पाए थे। इस बीच कांग्रेस ने महंगाई के लिए सीधे तौर पर पवार को जिम्मेदार ठहराया है। पवार को कांग्रेस एकदम से निपटाने की हर कोशिश में लगी है। पवार कभी बाल ठाकरे से मिलकर तो कभी पूरी सरकार को महंगाई के लिए दोषी ठहराकर कांग्रेस को लगातार परेशान करते ही रहते हैं। लेकिन उनको एक चेहरा चाहिए जो, महाराष्ट्र से बाहर भी कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर सके। अमर सिंह एक ऐसा चेहरा हैं जिन्हें एनसीपी अपने लिहाज से और अमर सिंह एनसीपी को अपने लिहाज से इस्तेमाल करने के लिए बेहद मुफीद दिख रहे हैं।

Wednesday, March 24, 2010

गुम होती गोरैया

गोरैया को बचाने की एक पहल शुरू हुई है। २० मार्च २०१० को पहली बार विश्र्व गोरैया दिवस मानाया गया। अच्छा है कि इस पृथ्वी पर और हमारे जीवन में गोरैया चहकती रहे। दरअसल गोरैया घरेलू चिड़िया है। हमारे घरों में रहती, खिड़की और दरवाजे पर बैठकर चहकती है। आंगन में फुदकती है और चावल का दाना बीनने बड़े अधिकर से रसोई में चली आती है। पर अब नहीं, पहले था जब हम गांवों में थे। अक्सर होता था गौरैया खाना खाने के दौरान हो या फिर कहीं कोई अन्न फैला हो हमारे आसपास ही चहकती नजर आती थी लेकिन गोरैया भी अब लुप्तप्राय है। विरले ही दिखती है जिस तरह के मकानों में अब हम रहने लगे हैं। उसमें गोरैया के लिए कोई जगह ही नहीं बची। गोरैया बड़े पेड़ों पर नहीं रहती जंगलों में भी नहीं। वह कहां घोंसला बनाए। घर के आंगन और छतों की मुंडेर पर चहकने वाली गौरैया की आबादी पर मोबाइल टावरों से घातक असर पड़ा है। इस बात को सरकार ने भी कुछ समय पहले स्वीकार स्वीकार किया था। पर्यावरण और वन राज्यमंत्री जयराम रमेश ने अपने मंत्रालय के पास उपलब्ध सूचना के आधार पर बताया था कि पंजाब यूनिवर्सिटी का पर्यावरण और व्यावसायिक अध्ययन केन्द्र वर्तमान में पक्षियों पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण के प्रभाव पर स्टडी कर रहा है। केरल पर्यावरणीय अनुसंधानकर्त्ता संघ ने भी लगभग एक साल तक स्टडी की, जिससे पता चलता है कि मोबाईल फोन टावरों के अवैज्ञानिक प्रसार ने घरेलू गौरैया की आबादी पर घातक प्रभाव डाला है। एक वक्त था कि हर गांव शहर में अलसुबह या सांझ के झुटपुटे में आसमान में पंछियों की पंक्तियां दिखाई देती थीं। तब हर कहीं तरह-तरह के पंछियों की मीठी आवाजें सुनाई देती थीं। लेकिन अब हर कहीं जिस तरह लोगों के घर बस रहे हैं, उससे पंछियों के बसेरे उजड़ रहे हैं। आज घरेलू चिड़ियां, कबूतर, घुग्घी, तोते, कौवे, चील, बाज, गिद्ध आदि पक्षी नजरों से ओझल होते जा रहे हैं। कभी पेड़ों की टहनियों पर अपनी मजबूत चोंचों से सूराख करते कठफोड़वे की ठुकठुक सुनाई देती थी। मन को खुश कर देने वाली कोयल की कुहूकुहू सुनाई देती थी? पक्षी ही नहीं, रंग बिरंगी तितलियां, कानों में गुंजन करते भौंरे, गिलहरियां और रात में रोशनी के मोती बिखेरने वाले जुगनू भी अब यहां के वातावरण का हिस्सा नहीं रहे हैं। बड़े शहरों में आमतौर पर जंगली या पहाड़ी पक्षियों के बजाय शहरी पक्षी ज्यादा पाए जाते रहे हैं मसलन चार तरह की मैना, घरेलू चिडिय़ा या गौरैया, चोटी वाली चिड़िया, कबूतर, हुदहुद, फाख्ता या घुग्घी, कोयल, रॉबिन चिडिय़ा, बुलबुल, कौवा, चील, बाज, धनेश या हॉर्नबिल, गिद्ध, कई तरह के उल्लू, दजिर्न चिडिय़ा, दोतीन तरह के कठफोड़वा और तोते। लेकिन अब जाने कहां चले गए हैं ये सब? सफेद पीठ वाला गिद्ध तो देश के दूसरे इलाकों से भी गायब हो गया है। इसकी वजह बताई जाती है, मवेशियों के लिए प्रयोग होने वाली डिक्लोफेनिक दवाई। जिन मरे हुए मवेशियों को ये गिद्ध खाते थे, उनसे यह जहर इनमें पहुंचता गया और वे खत्म होते चले गए। इसी तरह चील व बाज भी कम हो गए हैं। अब शहरों के आसपास के खेतों की जगह बिल्डिंगों ने ले ली है तो तीतरबटेर भी गायब हो गए हैं। दुनियाभर में पक्षियों की ९००० प्रजातियां हैं जिनमें से १२०० भारत में हैं। हमारे यहां मोर इसलिए कम हुए हैं क्योंकि वे जमीन पर अंडे देकर उन्हें २७ से २८ दिनों तक सेते हैं। इस काम के लिए उन्हें अब एकांत नहीं मिल पाता। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि पक्षियों का आसपास होना, उनकी आवाजें सुनना आदमी को सुकून देता हो या वे शहर की खूबसूरती में चार चांद लगाते हों बल्कि पर्यावरण संतुलन के लिहाज से भी उनकी अहम भूमिका है। फलफूल खाने वाले पक्षी, उनके बीज इधर उधर फैला देते हैं जिनसे नए पेड़ों की संख्या बढ़ती है। कुछ पक्षी आदमी को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े मकोड़ों को खा जाते हैं। मरे हुए जानवरों को खाने वाले पक्षी तो सफाई कर्मचारी की भूमिका निभाते हैं। ये पक्षी हमारी फूड चेन का भी अहम हिस्सा हैं। पक्षियों के न रहने से यह पूरी चेन डिस्टर्ब हो रही है जिसका खामियाजा आखिरकार इंसान को भी भुगतना पड़ेगा और भुगतना भी पड़ रहा है। भारत की आदिकालीन अरण्य सभ्यता में वनों, पेड़ पौधों और पशु पक्षियों के साथ मनुष्य के आत्मीय रिश्ते की झलक मिलती है। पशुपक्षियों को देवताओं का वाहन बनाकर भारतीय मनुष्य ने उन्हें पूजा की वस्तु तक बना दिया है। शिव का वाहन नंदी है , विष्णु को गरुड़ प्रिय है , कृष्ण ने गायों और मोरों को प्रतिष्ठा दी है। गणेश अपने वाहन चूहे से , तो लक्ष्मी उल्लू से खुश हैं। दुर्गा शेर की सवारी करती हैं और सरस्वती हंस पर विराजती हैं। शनि देवता कौए को और भैरव कुत्ते को अपना वाहन बनाते हैं। कार्तिकेय मोर को , इन्द्र ऐरावत हाथी को अपने साथ रखते हैं। शिव यदि सांपों को अपने गले में लपेटे रखते हैं , तो विष्णु शेषशायी हैं। हमारी लोककथाओं में तोता और मैना बोलती हैं , तो कौवा काकभुशुण्डि के रूप में आध्यात्मिक विमर्श में शामिल होता है। यह सोचना चाहिए कि हमारे कस्बों और गांवों से गिद्ध क्यों नष्ट हो रहे हैं, जो मरे हुए जानवरों को तत्काल लील जाते थे और इस तरह हमें गंदगी से बचाते थे। क्या आपको नहीं लगता कि अब आपके घर में कोई कौवा, कोई कबूतर या गौरैया झांकने नहीं आती और आती है तो पंखे से कटकर या वहां फंसकर मर जाती है। आकाश में कितने कम पक्षी हैं और जो हैं वे लैंड फिलिंग वाले इलाकों में मंडराते ज्यादा दिखते हैं। आपने कब किसी जगह पिछली बार किसी तितली को देखा था ? जब पानी नहीं तो जंगल नहीं और जंगल नहीं तो पक्षी नहीं।

शादी से पहले सेक्स अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

शादी से पहले सेक्स अपराध नहीं है। लिवइन रहना भी अपराध नहीं है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन, जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस बी. एस. चौहान की बेंच ने २३ मार्च को कहा, जब दो लोग साथ रहना चाहते हैं, तो इसमें अपराध क्या है। कोर्ट ने तो यहां तक कहा कि मिथालजी के मुताबिक भगवान कृष्ण और राधा भी साथ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात साउथ की मशहूर ऐक्ट्रेस खुश्बू के एक मामले में कही है। कोर्ट के इस फैसले के बाद लिवइन रिलेशनशिप को लेकर हमारे भारतीय समाज में खासी हलचल है। पर क्या लिवइन के इस मामले में कोर्ट की यह राय भगवान कृष्ण के उस सौंदर्य रूपी प्रेम और लिवइन में रहने वाले लोगों के उस ..... रूपी .... के साथ तुलना उचित है।
हालांकि मेट्रो शहरों में ऐसी मिसालें बढ़ती जा रही हैं, जहां युवक और युवतियां शादी के बंधन में बंध जाने की बजाय साथ रहने लगते हैं। कोर्ट के इस बयान के बाद लगता है कि हमारा समाज बालीवुड की फिल्म दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे के दौर से आगे निकल कर अब सलाम नमस्ते जैसी फिल्मों के दौर में पूरी तरह प्रवेश करने को आतुर है। इधर हमारी अदालतें भी लिवइन को उदार नजर से देखने लगी हैं और ऐसे रिश्ते से जन्मे बच्चों को उनका जायज हक दे रही हैं। इस तरह सोसायटी में लिवइन रिलेशनशिप को लेकर अब लोग हाय तौबा मचाते भी कम लोग ही नजर आ रहे, जैसे आज से दस साल पहले तक था। अलबत्ता ऐसे लोग भी कम नहीं, जो इस ट्रेंड को विवाह और परिवार के ट्रेडिशन के खिलाफ मानते हैं। उनका कहना है कि सदियों से लागू इन परंपराओं के टूटने से सोसायटी में बिखराव पैदा होगा। यानी उनकी नजर में, लिवइन रिलेशनशिप अनैतिक है। जाहिर है, यह एक बड़ा सामाजिक मुद्दा है, जिसका जवाब हमें हमारे भारतीय समाज के अंदर ही खोजना होगा। वैसे महाराष्ट्र सरकार तो लिव इन रिलेशन को कानूनी मान्यता देने के लिए प्रस्ताव पहले ही पारित कर चुकी है। यदि केंद्र सरकार की मंजूरी मिल जाए, तो यह महाराष्ट्र में कानून भी बन सकता है। वैसे भी महाराष्ट्र में लिव इन रिलेशनशिप की संख्या काफी ज्यादा है। गौरतलब है कि २००८ में भी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि लंबे समय से लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे महिला पुरुष को मैरिड कपल्स की तरह ट्रीट किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या होंगे इस फैसले के दूरगामी प्रभाव। लिवइन रिलेशनशिप एक तरह से महानगरों में अब कल्चर का हिस्सा बन गए हैं। थोड़ी बहुत हिचक के साथ प्रोग्रेसिव लोगों ने इस रिलेशनशिप को एक तरह से स्वीकार ही कर लिया है। बावजूद इसके अधिकतर भारतीय अभी भी इसके खिलाफ ही हैं। दरअसल, इस रिलेशनशिप को लोग अभी भी मौज मस्ती वाले रिलेशनशिप के रूप में ही देखते हैं। वैसे, काफी हद तक यह सही भी है। आखिर अगर कोई शादी के बाद की स्थिति को सहर्ष स्वीकार करने को तैयार हो, तो भला इस रिलेशनशिप की उसे जरूरत ही क्यों होगी? शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले से, जिसके अनुसार अब लिवइन रिलेशनशिप में पैदा हुई संतान को भी कानूनी वैधता मिलेगी, से तमाम लोग निराश भी हैं। हालांकि कुछ लोगों के लिए यह एक बड़ी खुशखबरी है। जो लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से निराश हैं, उनकी चिंता यह है कि इससे शादी नामक संस्था पर असर पड़ेगा। आखिर अगर लिवइन इतना आसान होगा, तो लोग भला शादी के फेर में क्यों फंसना पसंद करेंगे?

Monday, March 15, 2010

शादी का लाइसेंस

ईरान में बाकी दुनिया की तरह बढ़ते तलाकों की वजह से चिंतित ईरान सरकार ने एक नया फरमान जारी किया है। इसके मुताबिक अब किसी भी नौजवान को शादी करने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना होगा। लाइसेंस के लिए उसे बाकायदा अप्लाई करना होगा, उसके बाद तीन महीने की आनलाइन ट्रेनिंग होगी। इसमें पास होने के बाद प्रमाणपत्र मिलेगा और तब निश्चित होगा की शादी की शहनाइयां बजेगी की नही। ईरान सरकार का यह आइडिया फिजूल की कसरत कहा जा सकता है। इससे टूटते परिवारों की समस्या खत्म होने वाली नहीं है। ईसाइयत और तमाम मजहब परिवार को बचाने की मुहिम चलाए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद अमीर और अमीर होते समाजों में तलाक बढ़ रहे हैं। प्राइवेट लाइफ में सरकार का बेवजह दखल कोई भी नहीं बर्दाश्त कर सकता। मान लीजिय ईरान सरकार के नए फरमान के मुताबिक कोई भी नौजवान इस प्रमाणपत्र को प्राप्त कर शादी कर भी लेता है और उसके बावजूद तलाक दे देता है, तो वहां की सरकार क्या कर लेगी और इससे भला कैसे तलाक की समस्या का निदान हो जाएगा। सोचिए कि अगर हमारे देश में यह कानून लागू होता तो अब तक पूरे देश में बवाल मच चुका होता। जिस देश मे ंराहुल महाजन और राखी सावंत जैसे लोग स्वयंबर रचा रहे हैं। राखी सावंत को स्वयंबर के बाद भी अपने होने वाले पति से मोह भंग हो जाता है। अब देखते हैं कि ईरान सरकार का यह फरमान वहां के लोगों पर कितना असरकारी साबित होगा।

Saturday, March 13, 2010

...हम हिंदुस्तानी

भारत का हर हिस्सा सबके लिए है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने पटना में यही कहा था। मुंबई यात्रा के दौरान भी उनका यही आशय था। मुकेश अंबानी हों या फिर सचिन तेंदुलकर सभी खुद को पहले भारतीय मानते हैं। अभी हाल में आशा भोंसले ने भी यही बात नये अंदाज में कही है। मुंबई हो या फिर चेन्नई अथवा कोलकाता सभी क्षेत्रीयता के रंग से यदा कदा प्रभावित होते रहे हैं। अब यह बात जोर पकड़ने लगी है कि हम गुजराती, मराठी, बंगाली बाद में हैं और भारतीय पहले। जाने-माने उद्योगपति मुकेश अंबानी ने यही कहा। महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का भी यही मत था। यही बात बालीवुड के किंग खान शाहरुख ने भी कही। संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत सहित भाजपा के आला नेताओं ने भी इस मुद्दे पर शिवसेना और मनसे को खरी-खोटी सुनाई। लगातार इन्हें करारे जवाब मिले। इन्हें मुंह की खानी पड़ी लेकिन इनका रवैया नहीं बदला। पिछले कुछ वर्षों से मुंबई में यह सवाल बार-बार उठा कि आखिरकार मुंबई किसकी है, सभी देशवासियों की या सिर्फ मराठियों की। शिवसेना व मनसे ने इस सवाल को तीखा बनाया। उत्तर भारतीयों के खिलाफ खूब बवाल हुआ। इसी आधार पर यह दोनो दल महाराष्ट्र में लंबे समय से अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते रहे हैं। अक्सर महाराष्ट्र मनसे और शिवसेना की अंधेरगर्दी के कारण चर्चा में बना रहता है। कभी किसी मामले को लेकर तो कभी किसी अन्य मामले पर। अब जब न सिर्फ देश के हर कोने बल्कि पूरे महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों को निशाने पर लेने वाली मनसे और शिवसेना को करारा जवाब मिल रहा है तो इनकी बोलती बंद है। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान जब आशा भोंसले ने मनसे प्रमुख राज ठाकरे की मौजूदगी में कहा कि मुंबई उन सब लोगों की है, जो इस शहर में दिन-रात मेहनत करते हैं। इस पर न तो राज ठाकरे कुछ बोल पाए और न ही बाल ठाकरे और उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने ही कोई प्रतिक्रिया दी। शायद इनकी भी समझ में आ गया है कि अगर अब ये कुछ बोले तो उनके लोग ही खिलाफ हो जाएंगे। राहुल गांधी के मुंबई दौरे के बाद महारष्ट्र के लोगों ने इन दोनो ही दलों की नीतियों और कार्य शैली से किनारा करना शुरू कर दिया है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है।मुंबई किसकी है ? इस सवाल का जवाब देने के लिए आशा भोंसले को इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता था। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने आशा भोंसले को सम्मानित करने के लिए पुणे में कार्यक्रम का आयोजन किया था। मनसे पार्टी सुप्रीमो प्रमुख राज ठाकरे खुद उन्हें सम्मानित करने के लिए मंच पर मौजूद थे। इस मंच से आशा भोंसले ने कहा कि मुंबई उन सब लोगों की है, जो इस शहर में दिन-रात मेहनत करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय को देश के किसी भी हिस्से में जाकर रोजी-रोटी कमाने का हक है। आशा भोंसले ने एमएनएस नेताओं और समर्थकों को नसीहत देते हुए कहा कि महाराष्ट्र के लोगों को भी ऐसी ही कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि, मैंने दिन रात मेहनत की और अपने हिस्से की उपलब्धि हासिल की। कोई मुझसे यह नहीं छीन सकता। देश की मशहूर गायिका ने कहा कि मुझे मराठी बोलने में परेशानी होती है। मैं उसे सीखने की कोशिश कर रही हूं। मैं हिंदी बोलने में सहज महसूस करती हूं और उसे बोलना मुझे अच्छा लगता है। आशा का यह उद्बोधन सुनकर वहां मौजूद लोग और राज ठाकरे पहले तो हैरान हुए लेकिन बाद में सबने खूब तालियां बजाईं। आशा ने कहा कि वह पूरे भारत की हैं क्योंकि उन्होंने कई भाषाओं में गाने गाए हैं। कुछ महीने पहले जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने मुंबई का दौरा किया था तब शिवसेना और एमएनएस इस पर बौखला गईं थीं। बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने जहां जमकर बयानबाजी की वहीं राज ठाकरे ने महाराष्ट्र को देश से बांटने तक की बात कह डाली थी।