Saturday, August 14, 2010

-आजादी ................................

पंद्रह अगस्त १९४७ को जब सारा देश आजादी के जश्न में डूबा था। वहीं राष्ट्रपति महात्मा गांधी चिंतन में थे। शायद उनकी चिंता भविष्य की थी।   आखिर भारतीयों द्वारा राजकाज संभालने के बाद लोक तंत्र को कैसे अक्षुण्य बनाए रखा जा सकेगा।
आजादी का पहला दिन १५ अगस्त मगर आजादी मिली १४ अगस्त की मध्यरात्रि। आखिर ऐसा क्या था कि हमने आधी रात को सत्ता संभाली? सवाल यह भी है क्या महात्मा गांधी के उद्देश्य  पूर्ण हुए हैं?  वह भूदान ग्रामदान क्या निर्धनों ने स्वतंत्रता का अर्थ समझा? क्या गांधी, विनोबा, जयप्रकाश नारायण ने आम आदमी को जिस तरह आजादी के मर्म समझाए इसका भारतीय और प्रांतीय शासकों ने पालन किया? क्या राष्ट्रभाषा प्रचार समिति राष्ट्रभाषाओं के विभिन्न विद्यालय वास्तव में चलने दिए? क्या बेरोजगारों को भारतीय स्वतंत्रता का अर्थ समझने दिया गया? क्या खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ईमानदारी से चल पाया? क्या स्वतंत्रता के पश्चात तमाम ग्रामीण ग्रामों के मोहताज नहीं हो गए?
पराधीनता के समय अंग्रेजों ने जिस तरह भारतीयों को गुलाम बनाया था ठीक वैसे ही पंद्रह अगस्त १९४७ उपरांत भी भारतीय वैसे ही गुलाम बने हुए हैं? महात्मा गांधी ने कहा था भारत की आत्मा गांव में बसती है पर आज आधी शताब्दी पश्चात लगता है भारत नेताओं  अभिनेत्रियों, व्यापारियों करोड़पतियों, शेयर होल्डरों विदेशियों के मध्य भारतीय आत्मा रहती है। लाखों करोड़ों लोग अंग्रेजो के जमाने में भी निर्धन थे। स्तंत्रता दिवस के नाम पर भी निर्धन हैं। भारत के नेता आपातकाल के बाद अपने आपको वायसराय मानने लगे थे। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या सत्ता पर वर्षों तक काबिज नेता सत्ता सुख भोग सकते थे। हमें मालूम है नेहरू, इंदिरा राजीव परिवार ने जनतंत्र को राजतंत्र स्थापति कर दिया। स्वतंत्रता/ जनतंत्र/ भारतीय नागारिकता/ मानवाधिकार/ राजनीतिक दल/ संविधान भारतीय सभ्यता/ भाषा/ धर्म/ मेल मिलाप सब कुछ विदेशी सभ्यता अनुसार ही मान्य है?
अगर वास्तव में ईमानदारी से भारतीयता का जनतंत्र स्थापित होता तो आज का भारत दूसरे ही रूप का होता।
महात्मा गांधी ने भारत को आजादी की व्यवस्था भी नई तरीकों से करने को कहा था। गांधी जी ने राज नेताओं को तपस्वी त्यागी बनने को भी कहा था पर सुख भोगी नेताओं ने स्वतः गांधीजी को ठुकरा दिया। अब सवाल यह है जब भारतीय नवपीढ़ी को वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ ही नहीं जानने दिया। हर नागरिक को राष्ट्र का अर्थ नहीं समझाने दिया। हर किसी को इसका अनुशासन नहीं समझाया। प्रत्येक को पालन नहीं करने दिया और दुनिया से भारत को प्रथक पहचान बनने ही नहीं दी तब भारतीय स्वतंत्रता का अर्थ क्या होगा? तब क्या हम अपने देश में स्वतंत्र नागरिक नहीं है? या सत्ता भोगी राजतंत्री है? अब तो स्थिति यह है की  भारतीय सत्ता भोगी विपक्ष को दुश्मन मानती है। कोई भी चुनाव बाद परस्पर प्रेम मिलाप से राष्ट्र को नहीं चलने देता? फिर कैसे कह सकते हैं की भारत की आम जनता अपने ही देश मैं आजाद  हैं

Sunday, August 8, 2010

आध्यात्मिकता बनाम हिन्दुत्व

हालीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स हिन्दू हो गयी. देशभर की मीडिया इस खबर से अटी पड़ी है है कि उन्हें हिन्दू धर्म ने इतना प्रभावित किया कि उन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया. हाल के दिनों में अमेरिका में एक मजेदार बहस शुरू हुई है. वह बहस आध्यात्मिकता बनाम हिन्दुत्व की है. अमेरिका में धर्म के रूप में हिन्दुत्व का उल्लेख करनेवाले लोगों की कुल संख्या मुश्किल से दस से बारह लाख है. ऋषिकेश नवआध्यात्मवाद का नया तीर्थ बनकर उभरा है. पहाड़ और मैदान के मध्य में स्थित ऋषिकेश के आश्रम वैश्विक पहुंच रखते हैं और दुनियाभर से आध्यात्मिकता की तलाश में नागरिक यहां पहुंचते हैं. यहां के आश्रमों में आपको चीन, जापान से लेकर अमेरिका, यूरोप और अफ्रीकी देशों के नागरिक मिलेंगे. अमेरिका में पहली बार हिन्दू धर्म ग्रन्थों से परिचय राल्फ वाल्दो इमर्सन ने 200 साल पहले करवाया जब उन्होंने बोस्टन हार्बर पर हिन्दू धर्मग्रन्थों का अनुवादित पाठ किया. लेकिन भारत की ओर से पहली बार जिस संत ने अमेरिका में सनातन धर्म के बारे में सार्वजनिक परिचय करवाया उनका नाम है स्वामी विवेकान्द. 1893 में विश्व धर्म संसद में उनके द्वारा हिन्दू धर्म के बारे में ऐतिहासिक भाषण दिया गया. ईसाई धर्मगुरुओं के तीखे आक्रमणों के बीच स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को बहुत सटीक तरीके से हिन्दुत्व की व्याख्या की. स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिकी जमीन पर जिस आध्यात्मिकता की शुरूआत की वह कालांतर में एक प्रवाह बन गयी. अमेरिका अपनी आध्यात्मिक यात्रा की दो शताब्दी में ही हिन्दुत्व और आध्यात्मिकता के अंतर पर बहस कर रहा ह.ै

Sunday, July 11, 2010

बदहाल बुंदेलखंड

बुंदेलखंड में बेतहाशा गर्मी की वजह से न सिर्फ पीने के पानी की किल्लत हो गई है। बल्कि नदियां सूखने की वजह से बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ा है। तपिस और झुलसा देने वाली गर्मी ने बुंदेलखंड के कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा कर डाले हैं। हैरत इस बात को लेकर है कि राज्य सरकार गर्मी से उत्पन्न संकट को दूर करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनायें तो बना रही है, लेकिन धरातल में कारगर न हो पाने से लोगों की दिक्कत बढ़ी है।
आम तौर पर पथरीले बुंदेलखंड में गर्मी के मौसम में धरती जलती है लेकिन इस साल तो तापमान ने सारे रिकार्ड तोड़ डाले पारा ५० डिग्री के पार तक पहुंचा और गर्मी ने लोगों को बेहाल कर डाला। बुंदेलखंड में इस साल अप्रैल से ही आसमान ने जहां आग बरसाई वहीं धरती भी तवे की तरह लाल रही। इस साल अभी भी बुंदेलखंड वासियों को अच्छे मानसून का इंतजार है। अगर इस वर्ष भी वर्षा अच्छी न हुई तो बुंदेलखंड लगातार पांचवे वर्ष भी सूखा ही झेलेगा। लोगों का पलायन होगा औ भूख से मौते होंगी। पिछले मौसमों में लगातार कम बारिश के चलते जमीन के नीचे के जल स्तर में भारी गिरावट आई, नदियों का भी प्रवाह थम सा गया। गर्मी ने इस संकट को और बढ़ाया और हालात भयावहता की ओर है। शहर ही नहीं बुंदेलखंड के सैंकड़ों गांव पानी के संकट से जूझ रहे हैं। पानी के इस संकट के लिए विशेषज्ञ सरकार की नीतियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। बुंदेलखंड में जिस तरीके से नदियों का दोहन किया गया और पारंपरिक जल स्रोतों पर तवज्जों नहीं दी गयी। उसकी वजह से बुंदेलखंड में जल संकट पैदा हो गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई  हो या नदी और पहाड़ों का खनन की वजह से पर्यावरण संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा रहा है। नतीजा यह कि सूरज की तपिश की वजह से आम जनता का जीना हराम हो गया है गर्मी के हालातों को देखते हुए ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ ध्यान नहीं देती पिछली बार पानी की समस्या से निपटने के लिए साढ़े सात सौ करोड़ बुंदेलखंड को मिले थे। ये रुपया कहां गया किसी को पता नहीं है। इस बार बुंदेलखंड को १२ सौ करोड़ का झुनझुना मिला है लेकिन अगर काम के नाम पर कुछ हो रहा है तो वह सियासत है। समूचे बुंदेलखंड हलक से लेकर खेत तक प्यासा है। जानवरों के चारे का संकट है। तभी तो भूगर्भ जल निदेशालय ने शहर वासियों को पानी से होने वाली परेशानी से चेताया है। रिपोर्ट के अनुसार जल दोहन से बांदा से प्रतिवर्ष भूगर्भ जलस्तर ६५ सेंटीमीटर गिर रहा है जबकि झांसी में ५० सेंटीमीटर गिर रहा है। लखनऊ ५६ तो कानपुर ४५ है।
बुंदेलखंड विन्ध्य पठारी क्षेत्र में स्थित बांदा दक्षिणी पुनिनसुलर क्षेत्र में सेंडीमेंटस शैल समूह के अंतर्गत आता है। प्रदेश में सबसे गहराई वाला जल स्तर क्षेत्र बेतवा और यमुना की घटियों में पाया जाता है। इसमें बांदा चित्रकूट, हमीरपुर जालौन, झांसी सहित इलाहाबाद हैं। बुंदेलखंड में पानी की समस्या नई नहीं है। यहां भूगर्भ है। जल सीमित है क्योंकि धरती के नीचे की बनावट ही ऐसी है कि बहुत बड़ा जल का स्टोर नहीं हो सकता है। स्थिति तब भयावह हो जाती है जब हम लगातार भू गर्भ जल का दोहन करते आ रहे हैें और उसके रिचार्ज की उचित व्यवस्था हमारे पास नहीं है। साथ ही कम होती वर्ष बड़ा संकट है। केन नदी जनवरी में ही सूखने की स्थिति में आ जाती है। गर्मी के पांच महीने जुलाई तक पानी का घोर संकट रहता है। पारंपरिक जलस्रोत सूख जाते हैं। पिछले छह सालों से कम वर्षा बांदा में सूखे काल का प्रमुख कारण है। २००३ से २००९ तक कुल ३७२ दिन बारिश हुई। निरंतर गहराता जलसंकट जन जागरूकता, सामूहिक प्रयासों के अभाव के कारण पैदा हुआ है।
बुंदेलखंड में ज्यादातर क्षेत्र असिंचित होने के कारण बिना बुवाई के रह जाता है। सैंकड़ों लोग प्रदूषित पानी से उपजी बीमारियों के कारण मौत की नींद सो जाते हैं। कुछ क्षेत्र में हाथ, पैर में लकवा, आंखों की अंधता, पथरी, बवासीर, रक्त की कमी, टीवी आदि से ग्रसित रहते हैं। केन नदी को वीभत्स बनाने वाला चाहे करिया नाला हो या मंदाकिनी को प्रदूषित करने वाला सीवर देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदी में कितनी तादाद में जहर प्रतिदिन घुल रहा है। बहरहाल रसूखदार मंत्रियों के ग्रह जनपद से लेकर पूरे बुंदेलखंड में एक दर्जन लाल बत्तियां भले ही अपनी प्यास बुझा रही हों लेकिन गिरते जल स्तर ने बुंदेलखंडवासियों के हलक सूखा दिये हैं। बुंदेलखंड में सरकारी खजाने से जारी हुयी करोड़ों रुपये का इस्तेमाल जलसंचयन, जल प्रबंधन नहरों, तालाबों और कुओं की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाना था। साथ ही इन सभी स्रातों में बरसात का पानी एकत्र करने की योजना थी मगर न तो पानी एकत्र किया गया। न ही नहरों की तालाबों की सफाई हो सकी। आखिर सरकार का रुपया कौन डकार गया केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के वैज्ञानिक डा. डीएस पाण्डेय साफ कहते हैं कि चित्रकूटधाम मंडल के बांदा जनपद के आठ विकास खंड के चार हमीरपुर के सात में चार महोबा के पांच में तीन व चित्रकूट के पांचों विकास खंडों में जल स्तर एक से तीन मीटर नीचे खिसक गया है। केन बेतवा गठजोड़ से पहले अब भू गर्भ जल स्तर को बचाने की आवश्यकता है।
बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पोखर तालाब और सरोवर जीवन पालक हैं जहां पशुपक्षी ही नहीं आदमी भी अपनी प्यास बुझाता है। बीते दो दशक में अतिक्रमण के चलते तालाबों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप में कमी आई है। पटेल की माने तो डेढ़ करोड़ हजार तालाबों में करीब पांच सौ ही तालाबों में पानी है। सूरज की भीषण तपन से जहां जीव जन्तु बेहाल हैं वहीं जानवर प्यास बुझाने को जंगलों में भटक रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में कुल १५५३ तालाब हैं। जिसमें एक हजार सूख चुके हैं। बानगंगा नदी, कडैली नाला एवं बदरहा नाला के सूखने से पहाड़ों की तलहटों में बसे कुरुह, बरकठा, जरैला, राजाडाडी, खेरियां, महुई, कुलसारी एवं छतैनी गांवों में पेयजल संकट बढ़ा है।

उत्साह की लहर दौड़ा गयी क्वींस बेटन

राष्ट्रमंडल खेलों की मशाल क्वींस बेटन नवाबों के शहर लखनऊ में आयी तो पूरे शहर में उत्साह की लहर दौड़ गयी। नन्हें-मुन्ने बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक उसे एक झलक देखने और एक बार उसे छू  लेने की लालसा लेकर घंटों सड़क पर उस तरफ टकटकी लगाकर देखते रहे जिस रास्ते से क्वींस बेटन आ रही थी। तमाम देशों के झंडों के बीच लहराते तिरंगे और देशभक्ति की भावना से ओत प्रोत नारों के साथ स्कूली बच्चे कड़ी धूप के बावजूद घंटों क्वींस बेटन के इंतजार में सड़कों पर खड़े रहे।
क्वींस बेटन को सीतापुर के रास्ते लखनऊ  आना था। लखनऊ में उसका पहला स्वागत इटौंजा में होना था। इसी वजह से इटौंजा और लखनऊ के एतिहासिक आसिफी इमामबाड़े के बाहर लोगों का हुजूम जमा था। अपने निर्धारित समय से डेढ़ घंटा देर से इटौंजा पहुंची क्वींस बेटन के स्वागत के उत्साह में कोई कमी नजर नहीं आयी। इमामबाड़े के बाहर सुबह से ही स्वागत की तैयारियां चल रही थीं। इमामबाड़े के पास उसे शाम पांच बजे पहुंचना था। स्वागत की तैयारियां पूरी थीं। स्कूली बच्चे पसीने से लथपथ थे। इसी बीच खबर आयी कि क्वींस बेटन अब सीतापुर से चली है। उसे पहुंचते-पहुंचते तीन-चार घंटे लग जाएंगे। किसी और का इंतजार होता तो शायद लोगों की वापसी शुरू हो जाती लेकिन क्वींस बेटन का मामला था इसलिए स्कूली बच्चों ने अपने कार्यक्रम का रिहर्सल कर दिया। कुछ ही देर के बाद सड़क पर बढ़ती भीड़ को देखकर मुख्य मार्ग को बंद करना पड़ा। रास्ता बंद हो गया तो उत्साह चरम पर आ गया। स्कूली बच्चों ने अपना कार्यक्रम सड़क पर ही शुरू कर दिया। उधर क्वींस बेटन इटौंजा पहुंच चुकी थी। इटौंजा से लेकर बख्शी का तालाब तक सड़क के दोनों ओर लोगों का हुजूम स्वागत के लिए खड़ा हुआ था। क्वींस बेटन अपने लाव लश्कर के साथ आसिफी इमामबाड़े पहुंची तो लखनऊ के मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, ओलम्पिक संघ के पदाधिकारी सबके सब मुस्तैद थे। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि उन ऐतिहासिक पलों को कैद करने के लिए तैयार थे। इधर बादलों की ओट में सूरज छुपा उधर क्वींस बेटन का कारवां टीले वाली मस्जिद की तरफ से आसिफी इमामबाड़े की ओर मुड़ता नजर आया। क्वींस बेटन को देखते ही देशभक्ति से ओतप्रोत नारे वातावरण में गूंजने लगे। देशभक्ति के गीत लाउडस्पीकर पर सुनायी पड़ने लगे। खुली जीप पर चमचमाती क्वींस बेटन हजारों लोगों के बीच से गुजरती कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गयी। महत्वपूर्ण हस्तियों के हाथों में कुछ देर रहने के बाद क्वींस बेटन कानपुर रोड स्थित सिटी मान्टेसरी स्कूल के लिए रवाना हो गयी। सिटी मान्टेसरी स्कूल में स्कूली बच्चों ने क्वींस बेटन के सम्मान में एक से बढ़कर एक सांस्कृतिक कार्यव्रम प्रस्तुत किए।
अगले दिन क्वींस बेटन एक बार फिर इमामबाड़े के बाहर जा पहुंची। भीड़ इस बार भी खूब थी लेकिन इस बार स्कूली बच्चों से ज्यादा खिलाड़ी नजर आ रहे थे। यह नामवर खिलाड़ी भी स्कूली बच्चों की तरह से क्वींस बेटन को छूने और निहारने को लालायित नजर आ रहे थे। जब क्वींस बेटन जाने-माने खिलाड़ी विजय सिंह चौहान के हाथ में आयी और केडी सिंह बाबू स्टेडियम के लिए रिले दौड़ शुरू हो गयी। एक खिलाड़ी के हाथ से दूसरे खिलाड़ी के हाथों में पहुंचती क्वींस बेटन के डी सिंह बाबू स्टेडियम जा पहुंची। स्टेडियम से उसे उसकी मंजिल की तरफ रवाना कर दिया गया। लखनऊ से रायबरेली होते हुए राष्ट्रमंडल खेलों की यह मशाल देश की राजधानी दिल्ली के लिए कूच कर गयी।

Tuesday, June 29, 2010

रोचक हुआ राजनीतिक खेल

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के दौरे ने बिहार की राजनीति को एक नया रंग दे दिया है। उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को लागू करने की घोषणा करके मायावती ने बिहार के अन्य राजनीतिक दलों में खलबली मचा दी है। मायावती के दौरे का असर साफ नजर आने लगा है। सभी राजनीतिक दल अपने अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने में जुट गए हैं। 
बसपा सुप्रीमों मायावती के दौरे का असर भाजपा -जदयू गठबंधन पर साफ दिखायी देने लगा है। भाजपा-जदयू गठबंधन में आयी दरार का मुख्य कारण बसपा सुप्रीमो मायावती के सफल दौरे को ही माना जा रहा है। मायावती की जनसभा में जुटी भारी भीड़ से अन्य दलों को यह आभास हो गया है कि दलित और मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ सवर्ण मतदाताओं का रुझान भी बसपा की ओर बढ़ा है। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा को भले ही उत्तर प्रदेश की तरह अपेक्षित सफलता न मिले लेकिन बसपाके लिए  बिहार का चुनावी गणित काफी सक्षम प्रतीत हो रही है। 
हालांकि इससे पूर्व भी बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा को कोई बड़ी सफलता हासिल नहीं हुई थी क्योंकि उन चुनाव में बसपा सिर्फ (वोट कटवा ) के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकी थी। लेकिन बसपा ने धर्मनिरपेक्ष मतों का जातिगत आधार पर बंटवारा करके धर्मनिरपेक्ष दलों को काफी नुकसान पहुंचाया था। बसपा के इसी रूप का लाभ भाजपा-जदयू गठबंधन को मिला था और बिहार में इस गठबंधन ने सत्ता संभाली थी। यह कहना उचित न होगा कि बसपा ही बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार बनाने में मदद की थी। क्योंकि पिछले चुनाव में नीतीश कुमार की लोकप्रियता और जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद की अलोकप्रियता ने इस गठबंधन को सत्ता में पहुंचाया था। आगामी विधान सभा चुनाव में जहां इस गठबंधन को सत्ता में आने की चुनौती है वहीं लालू प्रसाद यादव और पासवान भी कांग्रेस को साथ लेकर सत्ता हासिल करने की चुनौती दे रहे हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में बहुमत हासिल करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने बिहार की सत्ता हासिल करने का सपना संजोया है। 
बिहार के सभी राजनीतिक दल बसपा की उपस्थिति से अपनी-अपनी सफलताओं के प्रति चिंतित नजर आ रहे हैं।  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  पर भी इस चिंता का असर साफ नजर आने लगा है। यही कारण है कि उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों से अपने को अलग करने का फैसला किया है। आमजनसभा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्धारा दी गयी आपदा धनराशि को वापस करने की घोषणा को नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। नीतीश अपनी इस रणनीति से एक तीर से दो शिकार करना चाह रहे हैं। पहला यह कि नीतीश कुमार मुस्लिम मतदाताओं के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि उनका सांप्रदायिक शक्तियों से कोई लेना देना नहीं। वह मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी हैं। दुसरा यह कि उनकी सरकार ने अपने सहयोगी दल भाजपा के दबाव में कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे कि अल्पसंख्यक हितों की अनदेखी की जाएगी। नीतीश कुमार अपनी इस चाल से एक तरफ कांग्रेस, लालू-पासवान गठबंधन के मुस्लिम मतों में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ बसपा के प्रति बढ़ते रुझान को भी रोकने का प्रयास कर रहे हैं। श्री कुमार अपनी इन राजनीतिक रणनीतियों के साथ-साथ अपने विकास कार्यों को प्रचारित प्रसारित करके अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। फिलहाल बिहार में बसपा की सक्रियता से चुनावी गणित काफी रोचक हो गया है। जहां राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, लोजपा अध्यक्ष रामविलाश पासवान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व कांग्रेस की प्रतिष्ठा  दांव पर लगी हुयी है। हालांकि कांग्रेस अपनी नयी जमीन तलाशने के प्रयास में नए-नए प्रयोग कर रही है।
फिलहाल बिहार का चुनावी रंगमंच बनकर तैयार है। सभी किरदार अपनी बदली भूमिका में नजर आ रहे हैं। कौन किसको अपने गले लगाएगा और किसकी पीठ में खंजर चुभायेगा यह जानने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन राजनीति के धुरंधरों की मांग बढ़ रही है। चौपालों और कस्बों में चुनावी चर्चा जोर पकड़ रही है। बहस का मुद्दा फिलहाल यही है कि नीतीश कुमार दुबारा सत्ता हासिल करेंगे या फिर लालू प्रसाद यादव और उनके राजनीतिक कुनबे की वापसी होगी। बसपा एवं सपा भी इस खेल को रोचक बनाने में जुटे हुए हैं।  इन सबसे अलग कांग्रेस अकेले दम पर ताल ठोंककर अपनी खोई जमीन वापस लाने को बेकरार है।