Monday, February 1, 2010
नहीं रहे छोटे लोहिया
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जनेश्वर मिश्र नहीं रहे। जनेश्वर मिश्र सपा के लो-प्रोफाइल लेकिन बेहद सम्मानित नेता थे। राजनीतिक हलकों में छोटे लोहिया के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्र का जन्म ५ अगस्त १९३३ को बलिया के शुभनथही गांव में हुआ था। उन्होंने समाजवाद की दीक्षा डाक्टर राम मनोहर लोहिया व राजनारायण जैसे प्रखर समाजवादी नेताओं से ग्रहण की। १९६९ के फूलपुर उपचुनाव में उन्होंने कांग्रेस के केशवदेव मालवीय को हरा कर सनसनी फैला दी थी। इसी सीट से उनके राजनीतिक गुरु डाक्टर राम मनोहर लोहिया १९६२ में नेहरूजी से हार गये थे। उत्तर प्रदेश की फूलपुर सीट शुरू से ही नेहरूजी की सीट मानी जाती रही है। यहां से जीतना किसी के लिए भी सम्मान की बात हो सकती है। बाद में उन्होंने एक चुनाव में वी.पी.सिंह जैसे राजनीतिक धुरंधर को भी हराया था। डाक्टर लोहिया के समाजवादी विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आरंभ किये गये अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की अगुवाई की थी। लोहिया को उनके शिष्यों ने अलग-अलग तरीकों से याद किया है किंतु जनेश्वर मिश्र का अंदाज सबसे निराला था। उनकी नयी दिल्ली स्थित कोठी पर साइन बोर्ड लगा है 'लोहिया के लोग'। सचमुच उनका घर हमेशा लोहिया के शिष्यों के लिए खुला रहा। समाजवादियों में एक अवगुण आम तौर पर देखा गया है। वे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा महत्व को सैद्धांतिक मतभेद का नाम देकर कई बार विभिन्न गुटों में बंटे, पुरानी पार्टी छोड़ी व नयी पार्टी बनायी लेकिन जनेश्वर मिश्र ने ऐसा कभी नहीं किया। वे जिसके साथ भी रहे खुल कर उसका साथ दिया। कभी व्यक्तिगत की टकराहटों को उन्होंने राजनीतिक रंग देने की कोशिश नहीं की। अव्वल तो वे किसी से नाराज नहीं होते थे, यदि कोई बात होती भी थी तो वे उसे पार्टी फोरमों पर ही उठाते थे। डाक्टर लोहिया की मृत्यु के बाद वे राजनारायण के सहयोगी के रूप में सक्रिय रहे। जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया तो वे उनकी पार्टी में शामिल हो गये। वे सपा के वरिष्ठतम नेताओं में से एक थे। सपा के प्रत्येक आंदोलन में उन्होंने शिरकत की। इसे संयोग ही कहेंगे कि जब वे आखिरी बार बीमार पड़े व अस्पताल में भर्ती हुए, वह सपा के प्रदेशव्यापी आंदोलन का इलाहाबाद में नेतृत्व कर रहे थे। वे भी अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं की तरह गिरफ्तारी देने के लिए आगे बढ़े लेकिन पुलिस ने खराब स्वास्थ्य के चलते उन्हें गिरफ्तार नहीं किया। समाजवाद के प्रति उनकी आजवीन आस्था बनी रही। इतनी लंबी राजनैतिक जिंदगी और बेदाग कट जाए यह किसे मयस्सर होती है लेकिन जनेश्वर मिश्र ने इसे सच कर दिखाया। वे तमाम गैर कांग्रेसी सरकारों में बतौर मंत्री शामिल रहे लेकिन उन्हें सत्ता का मद कभी नहीं हुआ। वे आम जनता से सीधे जुड़े रहे। छात्रों व नौजवानों में वे बेहद लोकप्रिय थे। सपा का थिंक टैंक माना जाता था उन्हें। इलाहाबाद जैसे राजनैतिक रूप से सक्रिय और जागते हुए शहर की वह संभवतया आखिरी कड़ी माने जा सकते हैं। वह शहर जिसने राजनीति में नेहरूजी, शास्त्रीजी, इंदिराजी, हेमवती नंदन बहुगुणा, वी.पी.सिंह केशवदेव मालवीय, डाक्टर राम मनोहर लोहिया, राजनारायण,एन डी तिवारी व सत्य प्रकाश मालवीय सरीखे नेताओं को पहचान दी। इसी इलाहाबाद में आखिरी सांस ली जनेश्वर मिश्र ने।उन्होंने हमेशा मूल्यों पर आधरित राजनीति की। वे अपने प्रबल विरोधियों के प्रति भी कभी असंसदीय टिप्पणी करके उन्हें आहत नहीं करते थे। राजनीति में अजातशत्रु माना जा सकता है उन्हें। समाजवादी पार्टी ने दिवंगत नेता के प्रति सम्मान जताने के लिए न सिर्फ अपने प्रदेश मुख्यालय का झंडा झुका दिया बल्कि सैफई में चल रहे सैफई महोत्सव को भी समाप्त घोषित कर दिया। सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का कहना था कि जनेश्वर मिश्र के निधन से राजनीति के एक शानदार युग का अंत हो गया। आज जब मूल्यों पर आधरित सिद्धांतों की राजनीति करने वाले चंद लोग ही बचे रह गये हैं, ऐसे में जनेश्वर मिश्र का चले जाना लंबे समय तक सालता रहेगा।
...अब मोदी के अंगने में
अब अमिताभ बच्चन कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के बाद वे गुजरात का प्रचार करेंगे। दूसरी तरफ मोदी कह रहे हैं वे अमिताभ की फिल्मों को प्रमोट करेंगे। कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन पैसे के वास्ते कुछ भी कर सकते हैं। पहले वे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के लिए कुछ भी करते देखे गए। अब जब उत्तर प्रदेश में सपा का ही ठिकाना नहीं रहा तो उन्होंने गुजरात को अपना नया ठिकाना नरेंद्र मोदी के सहयोग से बनाया है। बिग बी का रिकार्ड ब्रांड एम्बेसेडर के मामले में ज्यादा अच्छा नहीं रहा। सपा के राज्य में जब वे उत्तर प्रदेश के ब्रांड एम्बेसेडर थे तो माल राज्य सरकार के खजाने से जाता था और काम सपा का होता था, मार्फत अमर सिंह। उस समय उनकी ये सूक्ति भी प्रसिद्ध हुई थीं उत्तर प्रदेश में दम है, अपराध यहां पर कम है वैसे अपराध उत्तर प्रदेश में मालिक की दया से कभी कम नहीं हुए , बाद में जब चुनाव हुए तो पता चला कि उत्तर प्रदेश में दम है और समाजवादी पार्टी यहां सबसे कम है। अब तो स्थिति यह है कि कांग्रेस से भी कम। समाजवादी पार्टी टूट कर बिखरती जा रही है इसीलिए अमिताभ बच्चन ने भी अपने लिए नया प्रदेश ढूंढ़ लिया। वे गुजरात के ब्रांड एंबेसेडर बन गए। इतना ही नहीं कह रहे हैं कि बिना तनख्वाह के काम करेंगे? किसी समय उन्हें जो गुण मुलायम सिंह यादव में नजर आते थे वे सारे गुण उन्हें अब नरेन्द्र मोदी में दिखाई दे रहे हैं। मोदी ने फिल्म 'पा' से मनोरंजन कर हटा लिया। मोदी लगातार जीतते चले आ रहे हैं, प्रदेश में उनकी तूती बोल रही है। राजनीतिक गलियारे में कहा जा रहा है कि ऐसे संत को क्यों न्योतना जो जिस जगह भी पैर धरता है, बंटाधार कर देता है। अमर सिंह को हर सभा में भीड़ की गारंटी के लिए सिनेमा का सितारा चाहिए। नरेन्द्र मोदी तो गुजरात के सबसे बडे़ सितारे हैं। अमिताभ बच्चन कलाकार हैं। पिछले ४० वर्षों में जब भी अमिताभ बच्चन ने अपने आपको कलाकार कहा, लोगों को लगा कि वे उतने ही म.जबूत होंगे जितना कि एक बड़ा कलाकार होता है लेकिन टेलीवि.जन पर उनको नरेंद्र मोदी के सामने जिसने भी झुकते देखा लगा कि अब तक सभी गलत थे। 'पा' को मनोरंजन कर से रियायत दिलवाने के लिए वे किस मुकाम तक जा सकते हैं, वह भी दुनिया ने देख लिया। नरेंद्र मोदी की शान में अमिताभ बच्चन ने जिस तरह से कसीदे पढ़े उस से साफ़ लग गया कि अब गुजरात में भी वही सब होगा जो कभी उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने तो इस पर यहां तक कह दिया था कि 'मुलायम सिंह मेरे पिता हैं।' बीजेपी के नेता राजनाथ सिंह ने कहा था कि जीव विज्ञान के विद्वानों को यह पता करना चाहिए कि क्या बाप बेटे की उम्र में केवल चार साल फर्क हो सकता है। बहरहाल अब मुलायम सिंह सत्ता में नहीं हैं और जिस तरह से उनकी पार्टी चल रही हैं, सत्ता में बहुत दिनों तक आने की उम्मीद नहीं है। जब १८५७ में दिल्ली उजड़ गयी थी तो बड़ी संख्या में कलाकारों ने रामपुर और हैदराबाद को अपना ठिकाना बना लिया था। अब जब अमर सिंह भी सपा के खिलाफ हो गए तो अमर सिंह के कलाकार साथी अपने लिए नए ठिकाने ढूंढ़ रहे हैं। जहां तक मुलायम सिंह यादव का सवाल है, अमिताभ बच्चन को अहमियत देकर उन्होंने अपनी पार्टी के जनाधार को लगभग समाप्त कर दिया। मुलायम सिंह यादव ने अमिताभ बच्चन के परिवार के लिए जो किया, वह उन दिनों सबको अजीब लगता था. बाराबंकी .जमीन विवाद तो दुनिया जानती है। अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन को उत्तर प्रदेश में वह मुकाम दे दिया गया था जो समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं तक को सपने में भी हासिल नहीं था। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों पर न.जर डालें तो ऐसा लगता है कि आने वाले कई वर्षों तक मुलायम अमिताभ बच्चन को वह सारी सुविधाएं देने की स्थिति में नहीं रहेंगें। .जाहिर है कि उन सुविधाओ के लिए नयी जगह की तलाश शुरू हो चुकी है। वही तलाश अमर सिंह भी करते नजर आ रहे हैं। अमिताभ बच्चन के रिश्ते नेहरू -गांधी परिवार से बहुत खराब हैं, लिहा.जा वहां तो प्रवेश संभव नहीं था। मोदी का राज्य अमिताभ बच्चन की कर्मभूमि के करीब भी है। मोदी भी तैयार हो गए। उनकी राजनीतिक हैसियत भी ऐसी है कि वे अपनी पार्टी में जो चाहें कर सकते हैं। वे अमिताभ बच्चन के परिवार को वह राजनीतिक संरक्षण उपलब्ध करवा सकते हैं। लेकिन क्या भाजपा में अमिताभ बच्चन के लिए बिछ रही लाल कालीन को हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, शत्रुध्न सिन्हा जैसे सितारे बर्दाशत करे सकेंगे।
एक युग का अंत
ईश्र्वरीय सत्ता के बजाय यथार्थवाद में विश्वास करने वाले ज्योति बसु ने वामपंथ को इस तरह से आत्मसात किया कि वह उसका पर्याय बन गए। वह देश में इकलौते ऐसे राजनेता थे जिसके पीछे सत्ता चलती थी। उन्होंने जब तक चाहा पश्चिम बंगाल पर राज किया और जब चाहा तब सत्ता को स्थानांतरित कर दिया। ज्योति बसु की ज्योति बंगाल में इस तरह से फैली कि पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीति का मतलब ज्योति बाबू से ही लिया जाता था। पश्चिम बंगाल को ज्योति बसु के रूप में ऐसा मुख्यमंत्री मिला जिसे दुनिया ने कभी गलती करते नहीं देखा। देश जब उनकी जन्म शताब्दी मनाने की तैयारी कर रहा था तब उन्होंने नश्र्वर शरीर का साथ छोड़ दिया और उस ईश्र्वरीय सत्ता में विलीन हो गए जिस पर जीते जी विश्र्वास जताने के बजाय उन्होंने यथार्थवाद को महत्व दिया था। ज्योति बसु के निधन के साथ ही देश में वामपंथी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया। उनके निधन से पैदा हुए शून्य को भर पाना शायद ही संभव हो। ज्योति बसु पक्के कम्युनिस्ट थे। सम्पूर्ण कम्युनिस्ट। ईश्वरीय सत्ता में आस्था रखने वाले नहीं थे वे। उनकी आस्था थी यथार्थवाद में। शायद यही कारण था कि वामपंथ को उन्होंने न सिर्फ पढ़ा या माना, बल्कि पूरी तरह आत्मसात भी किया। बसु ने लंदन के मिडिल टेंपल में वकालत त्याग कर राजनीति को अपनाया और वह लगभग छः दशक तक देश के राजनीतिक परिदृश्य पर छाये रहने वाले एक ऐसे करिश्माई व्यक्तित्व थे, जिन्हें दलगत भावना से उपर उठकर सभी नेताओं ने भरपूर सम्मान दिया। कुछ लोग ज्योति बसु को बहुत ही भाग्यशाली मानते थे क्योंकि .जिंदगी में हमेशा उन्हें महत्व मिला। संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी में तो बी.टी.रणदिवे, श्री पाद अमृत डांगे, अजय बोस, सी.पी. जोशी, जेङ ए. अहमद जैसे कई बड़े नेता हुए लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वे सबसे बड़े और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे।भारतीय राजनीति के निराले व्यक्तित्व ज्योति बसु ने अपने पहला चुनाव १९४६ में लड़ा । इस चुनाव में उन्होंने प्रोफेसर हुमायूं कबीर को हराया जो मौलाना आ.जाद के बहुत करीबी थे। बाद में वे नेहरू जी की मंत्रिपरिषद में मंत्री भी बने। उसी वक़्त से वे बंगाल के नौजवानों के हीरो बन गये। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने बेशुमार बुलंदियां तय कीं जो किसी भी राजनेता के लिए सपना हो सकता है। १९७७ में कांग्रेस की पराजय के बाद उन्हें पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया गया। जब शरीर कम.जोर पड़ने लगा तो उन्होंने अपनी मर्जी से गद्दी छोड़ दी और बुद्धदेव भट्टाचार्य को मुख्यमंत्री बनवा दिया। उनका जीवन एक खुली किताब है। मुख्यमंत्री के रूप में उनका सार्वजनिक जीवन हमेशा कसौटी पर खरा उतरा। उनको कभी किसी ने कोई गलती करते नहीं देखा, न ही सुना। १९९६ की वह घटना दुनिया जानती है जब वे देश के प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वसम्मत उम्मीदवार बन गए लेकिन दफ्तर में बैठ कर राजनीति करने वाले माकपा नेताओं ने उन्हें रोक दिया। अगर ऐसा न हुआ होता तो देश देवगौड़ा को प्रधानमंत्री के रूप में न देखता। बहरहाल बाद के वक़्त में यह भी कहा गया कि यह मार्क्सवादियों की ऐतिहासिक भूल थी।वर्ष १९७७ में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वाममोर्चा सरकार के अगुआ के रूप में राज्य की सत्ता संभालने वाले बसु पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहे। गठबंधन की राजनीति के वे प्रथम सूत्रधार थे। जब उन्हें १९९६ में संयुक्त मोर्चा सरकार का प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया तो उनकी पार्टी ने इस पर सहमति नहीं जतायी।माकपा ने सत्ता में भागीदारी करने से इंकार कर दिया। इस पेशकश को स्वीकार नहीं करने पर बाद में बसु ने इसे ऐतिहासिक गलती करार दिया । पार्टी ने भी उनके इस िवचार को बाद में माना। बसु मार्क्सवाद में विश्वास करने के बावजूद व्यावहारिक नेता थे। पार्टी की कट्टर विचारधारा के बीच उन्होंने विदेशी निवेश और बाजारोन्मुख नीतियों को अपना कर अपने अदभुत विवेक का परिचय दिया था। इससे पूर्व पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार व सार्वजनिक वितरण प्रणाली को उन्होंने मजबूत किया। कुशल राजनीतिज्ञ, योग्य प्रशासक, सुधारवादी और अनेक मामलों में नजीर पेश करने वाले बसु को १९५२ से पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्यता लगातार हासिल करने का श्रेय जाता है। इसमें केवल एकबार १९७२ में ही व्यवधान आया। बसु ने पंचायती राज और भूमि सुधार को प्रभावी ढंग से लागू कर निचले स्तर तक सत्ता का विकेंद्रीकरण किया। ज्योति बसु ने १७ जनवरी २०१० को कोलकाता के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। एक जनवरी को उन्हें निमोनिया की शिकायत पर अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन पिछले उनके शरीर के अधिकांश अंगों ने काम करना बंद कर दिया था । उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। निधन के बाद उनका शरीर उनकी इच्छा के अनुरुप एक अस्पताल को दन दे दिया गया। ऐसा अप्रतिम उदाहरण कम नेता ही पेश कर पाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने भी अपने कार्यकाल के दौरान बसु के कामकाज की सराहना की थी। बसु की पहल पर लागू किए गए भूमि सुधारों का ही नतीजा था कि पश्चिम बंगाल देश का ऐसा पहला राज्य बना, जहां फसल कटकर पहले बंटाईदार के घर जाती थी। इस तरह वहां बिचौलियों की भूमिका खत्म की गई। बसु ने राज्य को एक मजबूत उद्योग नीति भी देने की कोशिश की लेकिन वे इसे अमल में न ला सके। उनके बाद जब बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल में आर्थिक निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए बेतहाशा राजनैतिक प्रयोग किये तो सिंगूर व नंदीग्राम जैसी लोमहर्षक वारदातें हुईं। ज्योति बसु के बेटे पश्चिम बंगाल के जाने-माने उद्योगपति हैं। साल्ट लेक में उनका विशाल आर्थिक साम्राज्य है। इसके बावजूद ज्योति बसु पश्चिम बंगाल में कम्युनिटों के पहले और आखिरी नायक थे। उन्होंने अपने बेटे का आर्थिक साम्राज्य बढ़ाने के लिए कभी अपनी अकूत सत्ता का दुरुपयोग नहीं किया। उनके कार्यकाल में पश्चिम बंगाल में कभी दंगा नहीं हुआ न ही साम्प्रदायिक विद्वेष उत्पन्न हुआ। उन्होंने केंद्र-राज्य संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए आवाज उठाई। इसके चलते अस्सी के दशक के अंत तक सरकारिया आयोग का गठन किया गया। उन्होंने गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को एकजुट कर केंद्र के समक्ष अपनी मांगे भी रखी थीं। बसु ने राज्य में लोकतंत्र के दायरे में रहते हुए पार्टी को मजबूत करने के लिए भी अपने सहयोगियों और कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। १९७७ में मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्योति बाबू के राजनैतिक जीवन में उतार के दौर कम ही आए। अब इसे ज्योतिषीय भाषा में उनकी कुंडली का महाबली होना कहिए उनके प्रारब्ध में चढ़ाव ही चढ़ाव लिखा होना कहिए या फिर उनकी प्रबल इच्छाशक्ति, जिस काम में भी उन्होंने हाथ डाला उससे पीछे कभी नहीं हटे। पश्चिम बंगाल जैसे राजनैतिक रूप से सचेतन प्रदेश में विपक्ष का सफाया कर एकछत्र वामपंथी राज चलाने को इसके सिवा क्या कहा जाए। ज्योति बाबू जैसा दूरदर्शी प्रशासक कभी भी अपने फैसले से पीछे नहीं हटा। उन्होंने पार्टी नीतियों के खिलाफ मुंह न खोलने का व्रत हाल के वर्षों में ही तोड़ा। अपने उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य की किसानों की जमीन हड़पने की नीतियों और सिंगूर व नंदीग्राम में गोली चलाने की घटनाओं से वे बेहद खफा थे। यह बात उन्होंने कुछ बयानों के माध्यम से प्रकाश में भी लायी। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उनका यह बयान कि 'लोकसभा चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा' अंततः सच साबित हुआ।
...दोस्त दोस्त न रहा
एक कहावत है राजनीति में स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं हुआ करते। अमर सिंह-मुलायम सिंह यादव के विवाद से इस कहावत को नया दृष्टांत प्राप्त हुआ है। मुलायम सिंह और अमर सिंह की दोस्ती राजनीति के सारे सिद्धांतों को तोड़ कर एक नए मुकाम पर जा खड़ी हुई थी। फिलहाल यह दोस्ती की डोर अब टूट चुकी है। इस राजनीतिक लड़ाई में कौन कौन खपेगा यह तो काल और परिस्थिति खुद तय कर देगी पर जिस तरह से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के वरिष्ठ नेता अमर सिंह द्वारा दिए गए इस्तीफे स्वीकार करने के बाद कहा कि 'अमर सिंह की नीति और नीयत समाजवादी पार्टी को मजबूत करने और बढ़ाने की रही। हम उनके आभारी हैं और उनके संबंध में न कोई आलोचना की करुंगा और न ही कोई बुराई करुंगा।' इतना ही नहीं उन्होंने तो यह भी कहा कि 'सपा एक मेला है, मेले में लोगों का आना जाना लगा ही रहता है।' यह राजनीति का वह अध्याय है जो अमर सिंह और सपा के साथ जुड़ता है। अमर सिंह की राजनीतिक यात्रा को देखें तो पता चलता है कि उन्होंने जो भी राजनीतिक बुलंदी हासिल की उसमें सपा व मुलायम का बड़ा हाथ है।आजमगढ़ के अमर सिंह ने अपनी राजनीतिक यात्रा कोलकाता से शुरू की। उनकी राजनीतिक शुरुआत कांग्रेस से हुई। अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए कोलकाता आने वाले कांग्रेसी नेताओं की आवभगत करने में वे कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे। इसी आवभगत के दौरान उनकी जान पहचान पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय दिनेश सिंह के निजी सचिव से हुई। दिनेश सिंह के निजी सचिव से अमर सिंह की जब पहली मुलाकात हुई तो उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस के ताकतवर नेता अरुण कुमार सिंह 'मुन्ना 'भी साथ थे। इस माध्यम से अमर सिंह ने दिनेश सिंह के साथ नजदीकी बढ़ायी और दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में सक्रिय हो गए। इसी दौरान वे मशहूर उद्योगपति के.के. बिड़ला के नजदीक आए और उनके जनसंपर्क अधिकारी बन गए। इसके बाद अमर सिंह की राजनीतिक गतिविधियों को सभी जानते हैं।इसी दौरान उनका मुलायम सिंह यादव से परिचय हुआ। मुलायम पर उनका जादू कुछ इस तरह चला कि नेताजी के पुराने दोस्त भी पिछड़ गए। यह वही अमर सिंह हैं जिन्होंने १९९८ में एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस की सरकार नहीं बनने दी। बाद में इन्हीं अमर सिंह ने परमाणु करार के मसले पर २००८ में मनमोहन सिंह की सरकार गिरने से बचायी। एक अहम सवाल अब भी राजनीतिक गलियारों में उठता रहता है कि आखिर अमर सिंह की राजनीति है क्या। क्या अमर सिंह ने जो मौजूदा गतिविधियां शुरू की हैं वह किसी खास दल के इशारे पर है। सवाल यह भी है कि कल्याण सिंह को मुलायम सिंह यादव के नजदीक लाकर क्या अमर सिंह ने किसी दल की मदद की। शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। यह शुरुआत कहां से हुई सभी जानते है। समाजवादी पार्टी के कई नेता इस समय कांग्रेस में हैं। ये वही नेता हैं जो चंद्रशेखर से अलग होने के बाद मुलायम सिंह यादव की पार्टी के गठन के दौरान उनके सहयोगी थे। इसमें बेनी प्रसाद वर्मा और राज बब्बर प्रमुख मानें जा सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि अमर सिंह ने सारा कुछ उसी दल के इशारे पर किया। क्या सपा के अन्य प्रमुख नेताओं राज बब्बर व बेनी प्रसाद वर्मा की तरह अमर सिंह भी देर सबेर कांग्रेस में शामिल होंगे। लेकिन तब क्या कांग्रेस में घमासान नहीं मचेगा। अमर सिंह ने अभी सपा को अलविदा नहीं कहा है। वे अभी भी सामान्य कार्यकर्ता की हैसियत से इसी पार्टी में हैं। यह भी एक नया खेल है। संजय दत्त और जयाप्रदा खुल कर उनके साथ है। जया बच्चन भी साथ हैं। यानि कि फिल्म से जुड़े सपा के सभी नेता अमर सिंह के साथ हैं पर मुलायम सिंह के कई साथी अब उनके साथ नहीं हैं। इलाहाबाद के सांसद रेवती रमण सिंह सोनिया गांधी से मुलाकात कर आए हैं। सलीम शेरवानी ने यह मुलाकात कराई। कुछ अन्य सांसद बसपा के संपर्क में हैं। इधर अमर सिंह अपने ठाकुर राजनीति को भी सहारा देने की कोशिश में है। अमर सिंह अड़ गये हैं। वे कह रहे हैं कि पार्टी नहीं छोड़ेंगे बल्कि पार्टी ही खत्म कर देंगे। हाल ही में एक पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि वे सपा से बाहर नहीं जाएंगे। वे कहते हैं कि 'धक्के मारकर मुझे बाहर कर दो, मैं चला जाऊंगा। 'अमर सिंह काफी चालाक नेता माने जाते हैं तभी वह कह रहे हैं कि न तो सपा से बाहर जाएंगे और न ही नेताजी के खिलाफ कुछ बोलेंगे। वे कह रहे हैं कि मुलायमवादी होने की बजाय समाजवादी होना पसंद करेंगे। फिलहाल दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि अमर सिंह जिस काम के लिए सपा में प्लांट किये गये थे वह उन्होंने कर दिया। सपा से कल्याण सिंह को जोड़कर उन्होंने मुस्लिम मतों का बिखराव किया। मुस्लिम मतदाता अब शायद ही दोबारा सपा में लौटे। सपा से अलग होकर मुस्लिम मत किसकी झोली में गिरेंगे सभी जानते हैं। उत्तर प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी बनने लिए सपा और कांग्रेस में जोर आजमाइश चल रही है। हो सकता है उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभ्ाा चुनाव सपा और बसपा के बीच न होकर बसपा और कांग्रेस के मध्य लड़ा जाए। मुलायम सिंह की सबसे बड़ी चिंता यही है। इसलिए कल्याण के साथ भाईचारा पीछे छोड़ वे अपना राजनीतिक वजूद बचाने में लग गये हैं। इसकी शुरुआत भी मुलायम सिंह ने लखनऊ मे बसपा के खिलाफ आंदोलन तेज करते हुए दी।
Monday, January 25, 2010
दीन हीन भारतीय हाकी
बातचीत की और खिलाड़ियों को आश्वस्त किया कि उन्हें सभी वित्तीय सहायता दी जाएंगी एवं उनकी मांगे भी मानी जाएंगी। खिलाड़ी अपनी शर्तों को माने जाने के बाद प्रशिक्षण शिविर में लौट गए। हाकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अपनी मांग उठाने के बाद कुछ राज्यों ने इन्हें आर्थिक मदद की पेशकश भी की। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पूरी टीम को वित्तीय मदद देने का प्रस्ताव किया है। पंजाब के उपमुख्यमंत्री और हाकी पंजाब टीम के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी कहा कि उनका राज्य हाकी टीम का प्रायोजक बनने को तैयार हैं, बशर्ते खेल मंत्रालय उसे यह उत्तरदायित्व देने को तैयार हो। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने खिलाड़ियों को आर्थिक मदद देने के उद्देश्य से हाकी इंडिया को ५ करोड़ रुपये की मदद देने की घोषणा की। जबकि टीम के प्रायोजक सहारा ने खिलाड़ियों के लिए एक करोड़ रुपये देने का ऐलान किया। उल्लेखनीय है कि १३ मार्च २०१० से दिल्ली में वर्ल्ड कप टूर्नामेंट शुरू होना हैं। देश के हाकी बोर्ड द्वारा हाकी इंडिया की टीम को बकाया भुगतान न किए जाने के बाद देश के हाकी खिलाड़ियों ने हाल ही में बोर्ड से बगावत कर दी थी। वैसे देखा जाए तो हाकी खिलाड़ी किन हालात में खेलते आ रहे हैं यह देख लेगे के बाद कोई भी इन खिलाड़ियों का समर्थन करता नजर आएगा। गौरतलब है कि मीडिया जगत में आखिरी बार हाकी का जिक्र तब हुआ था, जब भारतीय हाकी संघ को पिछले साल अप्रैल में भंग कर दिया गया था। फेडरेशन के अध्यक्ष पर गुंडई के इतने आरोप लगे कि भारतीय ओलंपिक संघ ने इस संस्था को ही ध्वस्त कर दिया। इसके बाद न कभी हाकी का जिक्र हुआ और न ही उसके खिलाड़ियों का। अब कोई दस महीने बाद एक बार फिर भारतीय हाकी का जिक्र हो रहा है लेकिन जिस घटनाक्रम के तहत यह चर्चा शुरू हुई है वह इस खेल के लिए राष्ट्रीय शर्म से कम नहीं है। पहले दुनिया में भारत और पाकिस्तान हाकी के प्रतिनिधि देश माने जाते थे। भारत ने हाकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दे रखा है। जैसे दूसरे सभी राष्ट्रीय प्रतीकों का बुरा हाल है वैसे ही हाकी की भी हालत खस्ता है। हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की कहानियां पढ़कर समझदार हुई पीढ़ी को जब पता चला कि हाकी जैसा कोई खेल भी है जो राष्ट्रीय खेल है। सरकार ने हाकी की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए एकमात्र राष्ट्रीय स्टेडियम का नाम भी ध्यानचंद के नाम पर कर रखा है। उस दौर में जब ध्यानचंद हाकी खेलते थे तो भारत का नाम इस खेल में चमचमाता था। हाकी ही एकमात्र ऐसा खेल है जिसने ओलंपिक में भारत को आठ स्वर्ण पदक दिलाए हैं। समय के प्रवाह में क्रिकेट सर्वप्रिय खेल बन गया। कारपोरेट घरानों ने भी इसे पागलपन की हद तक जुनून बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जैसे अंग्रेजों की हर हरकत हमें आकर्षित करती है वैसे ही लाट साहब के इस खेल ने भी दिल में खास जगह बना ली। जैसे हिन्दी राष्ट्रीय भाषा होते हुए भी गैरजरूरी समझी जाती है वैसे ही हाकी राष्ट्रीय खेल होते हुए भी नकारा खेल बनता गया। आस्ट्रेलिया अगर आज क्रिकेट में आगे की पंक्ति पर खड़ा है तो वह हाकी, टेनिस, तैराकी, फुटबाल में भी अपनी धाक जमाये हुए है। जर्मनी फुटबाल खेलता है तो हाकी में चुनौती ह। टेनिस में भी वह नाम कमाता है। चीन ने ओलंपिक में अमेरिका को नाको चने चबवा दिए। लेकिन अपने यहां क्रिकेट को ही सबसे बड़ा खेल मान लिया गया है। एक तरह से देश में क्रिकेट उन्माद पैदा कर दिया गया है। खेल भी अब बाजार के जिम्मे कर दिए गए हैं। बाजार तय कर रहा है कि वह किस खेल को कितना बेचे। इस मोलभाव में हाकी का कोई नाम नहीं ले रहा है।
दांव पर अस्तित्व
मोहन भागवत जब पिछले दिनों लखनऊ आये थे तो खासी राजनीतिक गहमागहमी देखी गयी। उनके स्वागत में कुछ उत्साही भाजपा कार्यकर्ताओं ने बैनर व पोस्टर टांगे। संघ के एक महत्वपूर्ण केंद्र रहे निरालानगर के सरस्वती शिशु मंदिर में उनका भाषण सुनने के लिए भाजपा के कई बड़े नेता पूर्ण गणवेश में इकट्ठा हुए। इसी तरह लखनऊ सहित प्रदेश के कई महत्वपूर्ण शहरों में पिछले माह बुजुर्ग भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन धूमधाम से मना करके माहौल को राजनैतिक रंग देने की कोशिश हुई। इन तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा में खास बदलाव का दौर शुरू नहीं हो सका। समूचे खेमे में मायूसी छाई हुई है और सन्नाटा पसरा हुआ है। हाल में संपन्न हुए विधान परिषद चुनाव में भी पार्टी खाता नहीं खोल सकी। इससे पहले प्रदेश में जितने भी विधान सभा उपचुनाव हुए उसमें भी भाजपा कोई खास सफलता नहीं हासिल कर सकी थी। अब भारतीय जनता पार्टी के सामने न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि देश भर में अस्तित्व बचाने का संकट उत्पन्न हो गया है। जब भी उत्तर प्रदेश में बसपा के राजनैतिक विकल्प की चर्चा छिड़ती है लोग या तो सपा का नाम लेते हैं या फिर कांग्रेस का। भाजपा की कोई भूल करके भी चर्चा नहीं करता है। पिछले एक डेढ़ साल से भाजपा उत्तर प्रदेश में कुछ भी नहीं कर सकी।भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में चौथे स्थान पर खिसक चुकी है। जबकि उत्तर प्रदेश में आज भी उसके पास राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तर पर कई बड़े नेता हैं। भाजपा की सबसे बड़ी चिंता यह है अब उसकी सामान्य तौर पर कोई चर्चा भी नहीं होती है। पिछले एक डेढ़ साल से जब भी प्रदेश में कोई चुनाव नजदीक आता है, भाजपा नेताओं के हाथ पांव फूल जाते हैं। उन्हें प्रत्याशी तक नहीं मिलते। हाल में संपन्न हुए विधान परिषद चुनाव में भाजपा को सभी छत्तीस सीटों के लिए प्रत्याशी नहीं मिल सके। पार्टी एक भी विधान परिषद सीट न जीत सकी।पिछले साल प्रदेश में जितनी भी विधानसभा सीटों के लिए उप चुनाव हुए भाजपा एक भी सीट नहीं हासिल कर सकी। लखनऊ पश्चिम की प्रतिष्ठापूर्ण सीट जो पिछले कई चुनावों से भाजपा नेता लालजी टंडन जीतते आ रहे थे, इस बार कांग्रेस ने हथिया ली। लालजी टंडन के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर जब भाजपा ने उनके पुत्र के स्थान पर पुराने कार्यकर्ता अमित पुरी को चुनाव मैदान में उतारा तो टंडन अपनी नाराजगी छिपा न सके। उनकी नाराजगी का ही नतीजा था कि भाजपा को अपनी मजबूत सीट से हाथ धोना पड़ा। अन्य सीटों पर भी यही हाल रहा।भाजपा की उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चिंता यह है कि कल्याण सिंह , कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, ओम प्रकाश सिंह के रूप में जो नेतृत्व१९८९-९० के दौर में उभरा था, अब ढलान पर है। कल्याण सिंह दूसरी बार भाजपा छोड़ चुके हैं। लालजी टंडन लखनऊ लोकसभा सीट से सांसद जरूर हैं किंतु उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी वह हैसियत नहीं है जो मायावती, मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह जैसे नेताओं की है। राजनाथ सिंह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल समाप्त करके इन दिनो अवकाश की मुद्रा में हैं। वे प्रदेश की राजनीति में नये सिरे से सक्रिय होंगे इसकी कम संभावना है। ओम प्रकाश सिंह पूर्वांचल के बड़े नेता जरूर हैं किंतु अब उनसे भी चमत्कार की उम्मीद करना व्यर्थ है। विनय कटियार जो कभी बजरंग दल के फायर ब्रांड नेता थे, एक जमाने में तेजी के साथ आगे बढ़े। इन्हें भरपूर लोकप्रियता भी हासिल हुई किंतु ये कुछ खास न कर सके।भाजपा के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष डा. रमापति राम त्रिपाठी भी अपना अलग राजनैतिक कद नहीं बना सके। न तो वे कभी पूर्वांचल के बड़े नेता थे और न ही प्रदेश स्तर पर उनकी गिनती होती थी। उनसे ज्यादा तो गोरखपुर के सांसद योगी आदित्य नाथ की भाजपा में पूछ है। गोरखनाथ पीठ के महंत होने के अलावा वे हिंदू युवा वाहिनी के बहाने भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों, कस्बों, शहरों व महानगरों में छाये हुए हैं। यह वही संगठन है जो कभी आखिल भारतीय हिंदू महासभा के नाम से जाना जाता था। हिंदू महासभा को अपने जमाने में महंत दिविजय नाथ और महंत अवैद्यनाथ ने भी आगे बढ़ाया था। यह संगठन उसी तरह प्रखर हिंदुत्व की वकालत करता है जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्र्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और शिव सेना। बहरहाल डा. रमापति राम त्रिपाठी भी भाजपा को नयी पहचान न दे सके।भाजपा को उत्तर प्रदेश में दुबारा पटरी पर लाने के लिए नितिन गडकरी और मोहन भागवत कौन से नये नुस्खे आजमायेंगे यह देखना दिलचस्प रहेगा। भाजपा से जुड़े संगठनों भारतीय जनता युवा मोर्चा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ का बुरा हाल है। विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी उत्तर प्रदेश में विस्तार थमा है। राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन के थम जाने के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई ऐसा मुद्दा नहीं मिला जिसके बल पर वह अपनी राजनैतिक जमीन बचाये रखती। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बसपा की तीन बार सरकार बनवाई। इससे बसपा तो लगातार मजबूत होती गयी किंतु भाजपा पिछड़ती गयी। उसे कल्याण सिंह की बगावत ने भी कमजोर किया। कल्याण सिंह ने पहले राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई, फिर वे सपा के बगलगीर हुए और अब उन्होंने जन क्रांति पार्टी बनाई हर बार उन्होंने भाजपा को ही कमजोर किया। भाजपा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसके पास उत्तर प्रदेश में कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं बचा जिसके सहारे वह आगे की राजनीति कर सके
अभियान के अगुआ
अपने मन की कहते हैं और विरोधियों पर पूरी सौम्यता से हमलावर होते हुए कांग्रेस के युवराज और महासचिव राहुल गांधी कांग्रेस के अभियान के नेता हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सफलता के झंडे गाड़ने के बाद अब कांग्रेस के युवा सम्राट राहुल गांधी ने बिहार की ओर अपना रुख किया है। अपने हाल के बिहार दौरों से श्री गांधी ने यह संकेत दे दिया है कि बिहार अब उनकी पहली प्राथमिकता है और बिहार में कांग्रेस को स्थापित करने में वह कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे।राहुल के बिहार के दौरों पर अगर एक नजर डाली जाए तो उससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी राहुल ने दलितों, शोषितों और गरीबों के बीच जाकर उनका दुःख दर्द सुनने का अभियान छेड़ दिया है। वैसे तो पूरे देश के कमजोर वर्गों की राहुल की ओर आशा भरी नजरें लगी हुई हैं लेकिन ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने क्रमबद्ध तरीके से अपना राजनीतिक एजेंडा तय कर दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली भारी सफलता का श्रेय राहुल गांधी को जाता है। इस चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद राहुल की निगाहें अब प्रदेशों के विधान सभा चुनाव पर है।इन्ही विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राहुल गांधी ने अपना राजनीतिक एजेंडा तैयार किया है। उन्होंने अपने एजेंडे में प्राथमिकता के आधार पर बिहार विधान सभा चुनाव को पहले स्थान पर रखा है। अगामी विधान सभा चुनाव में राहुल ने बिहार में कांग्रेस को पुनः वापस लाने का संकल्प किया है। बिहार में हो रहे उनके दौरों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में कांग्रेस को मजबूत करके राहुल उत्तर भारत में कांग्रेस की खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः हासिल करना चाहते हैं।धीरे धीरे राहुल गांधी उत्तर भारत में कांग्रेस की धूरी बनते जा रहे हैं। वैसे तो भारतीय राजनीति की धुरी धीरे-धीरे राहुल गांधी की तरफ केंद्रित होती दिखाई दे रही है। अलग-अलग लोगों के अलग-अलग मत हो सकते हैं लेकिन राहुल गांधी का विजन सिर्फ सत्ता की राजनीति तक सीमित नहीं है। सत्ता से ऊपर उठकर वह देश को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रहे हैं। देश के सामने चुनौतियां २२वीं सदी की हैंं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए राहुल हर प्रदेश का दौरा करके वहां की स्थितियों का अवलोकन कर उन पर कार्य कर कर रहे हैं। नये जमाने की नई चुनौतियों के लिए राहुल देश को तैयार करना चाहते हैं। वे अपने पिता राजीव गांधी की तरह अपने काम और विचारों के प्रति बेहद आश्वस्त हैं। भारतीय राजनीति में राहुल गांधी इकलौते ऐसे नेता हैं जिनका व्यक्तित्व कोरे कागज की तरह है। उनके व्यक्तित्व में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर, लीक से हटकर सोचने और कुछ करने की क्षमता है। कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव सहित महाराष्ट्र, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली आदि प्रदेशों में बेहतरीन काम करके दुबारा सरकार बनायी है तो उसमें कहीं न कहीं राहुल गांधी की राजनीतिक सोच का भी सकारात्मक असर पड़ा। अब इसी तर्ज पर वे बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में गरीबों, दलितों और आम आदमी के बीच जाकर उनकी परेशानियों से रू-ब-रू हो रहे हैं। आने वाले समय में बिहार में विधान सभा के चुनाव होने है। जिसके मद्देनजर राहुल प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत बनाने का काम कर रहे हैं। बिहार में राहुल गांधी ने 'एकला चलो' का नारा दिया है। हाल ही में अन्य प्रदेशों में भी उन्होंने इसी नारे के सहारे कांग्रेस की विजय पताका फहरायी और नतीजा सबके सामने है। वे उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस की वापसी चाहते हैं। हाल में युवक कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करने के लिए उन्होंने सीधे साक्षात्कार का सहारा लिया। बहरहाल मुद्दों पर संघर्ष के बजाय वे युवाओं पर विशेष निगाह रखना चाहते हैं। संघर्ष की बात वे अक्सर देश को याद दिलाते रहते हैं। आजादी और आंतकवाद से निपटने के लिए उनके परिवार ने कितनी कुर्बानी दी सभी जानते हैं। उनकी कोशिश है कि संघर्ष के बजाय युवाओं को अपना अभिमन्यु बनाया जाए। देश भर में कोई दस हजार कालेज हैं। हरेक कालेज में कम से कम सौ छात्रों को छांटकर उनको अपनी टोली में शामिल करना, जिनसे उनका सीधा संवाद हो, यह है राहुल की रणनीति। उनके टेलेंट हंट से प्रभावित एक युवा कांग्रेसी नेता का कहना है कि राहुल का यह सपना जब साकार होगा तब वह देश के युवाओं के अकेले नेता होंगे। इन पढ़े लिखे एक लाख नौजवानों के दम पर वे भारत की तस्वीर बदल देंगे। उनकी हंट प्रतिभा का प्रयोग और भर्ती की खबर प्रायःसुर्खियां बटोरती रहती है। राहुल वर्तमान समय में मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश , झारखंड आदि राज्यों में जाकर वहां के कालेजो, विश्र्वविद्यालयों में युवाओं से सीधे रू-ब-रू हो रहे हैं। जब वह किसी कालेज में जाते हैं तो सब पर उनका जादू बढ़ चढ़ कर बोलता है। इसलिए कभी दिल्ली तो कभी गुजरात के किसी कालेज में पहुंच जाते हैं। हाल में गुजरात में राज्य सरकार ने युवाओं के बीच कार्यक्रम की उन्हें अनुमति नहीं दी तो वे कालेज की कैंटीन पहुंच गए। कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश में कानपुर में चंद्रशेखर कृषि विश्व विद्यालय में उनके कार्यक्रम को इजाजत नहीं मिली तब भी वह वहां पहुंच गए। मध्य प्रदेश में छात्रों से मुलाकात कर उन्होंने देश के सामने आने वाली भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की। हाल ही में उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को संदेश दिया कि 'कांग्रेस को कोई और नहीं हराता बल्कि खुद कांग्रेसी ही हराते हैं।' कभी वह कहते हैं कि 'सभी पार्टियों में लोकतंत्र का अभाव है।' कुछ राजनैतिक पंडितों ने सवाल उठाया कि कांग्रेस खुद कोई लोकतांत्रिक पार्टी नहीं है लेकिन कांग्रेसियों ने खूब वाहवाही की। राहुल बड़े होने लगे हैं, लोकतंत्र की बात करने लगे हैं। कांग्रेस का कमाल है कि उसके पास लोकतंत्र की बात करने वाला महासचिव हैं।
देश की गरीबी के बारे उनके पिता राजीव गांधी को कम चिंता नहीं थी। उन्होंने सत्ता को दलालों से दूर रखने के साथ यह खुलासा भी किया था कि केंद्र के एक रुपये में से केवल पंद्रह पैसा ही नीचे पहुंचता है। उसका जिक्र कर राहुल गांधी अभी भी देश के गरीबों का हाल जानने की कोशिाश करते हैं। राहुल गांधी को जिस तरह उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की सराहना मिल रही है, वह भी एक सुखद आश्चर्य है। आमतौर पर हमारे नेताओं में अपने विरोधियों की प्रशंसा करने का बड़प्पन नहीं दिखाई देता। अब तो अपने विरोधियों की हरेक गतिविधि को आंख मूंदकर खारिज करना राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में अगर बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा, समाजवादी पार्टी की सांसद जयाप्रदा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राहुल गांधी के काम की तारीफ की तो यह निश्चय ही रेखांकित करने योग्य तथ्य है। शत्रुघ्न सिन्हा और जयाप्रदा ने किसी सियासी रणनीति के तहत ऐसा नहीं किया। न ही अपनी पार्टी के निर्देश पर इन्होंने ऐसा बयान दिया। इन्होंने तो अपने मन की बात खुलकर कही। इन्होंने राहुल के कामकाज का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। जयाप्रदा सपाई हैं तो शत्रुघ्न सिन्हा उस दल से हैं जिसने राहुल गांधी की गांवों की यात्राओं को ढोंग करार दिया। फिर भी शत्रुघ्न सिन्हा ने अपना विचार व्यक्त करने में संकोच नहीं किया। संघ भले ही कांग्रेस की अनेक मामलों में खिंचाई करता रहा हो पर गांवों से जुड़ने की राहुल की कोशिशों की उसने तारीफ की और सभी राजनेताओं को ग्रामीण जनजीवन से जुड़ने की सलाह दी । आरएसएस का कहना है कि अगर गांवों का विकास हुआ तो वहां से पलायन की समस्या पर रोक लग जाएगी। दरअसल राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति की जड़ता को तोड़ने की कोशिश की है। उनका संदेश है कि सियासत को एयरकंडीशंड कमरों से बाहर निकाला जाए। उसे पोलिटिकल मैनेजरों के चंगुल से मुक्त किया जाए और समाज के व्यापक वर्ग के हितों से जोड़ा जाए। दुर्भाग्य से ज्यादातर राजनीतिक दल इसे कांग्रेस का राजनीतिक हथकंडा ही मानते रहे हैं लेकिन इसे एक सबक के रूप में लिया जाए तो देश का ही भला होगा। कुछ अरसा पहले सोनिया गांधी ने कहा था कि उनका बेटा या बेटी अगर सियासत में आते हैं तो यह उनका अपना फैसला होगा। यह माना जा सकता है राहुल अपने विवेक से सियासत में सक्रिय हुए हैं। उनकी सक्रियता का ही नतीजा है कि कांग्रेस आज पूरे देश में हर जगह मजबूत हो रही है। राहुल को नेहरू-गांधी परिवार का जो प्रभामंडल मिला है उसकी एक खासियत यह भी रही है कि हर अगली पीढ़ी ने खुद को पिछली पीढ़ी से कुछ अधिक महत्वाकांक्षी, कुछ अधिक उग्र साबित किया है। मोतीलाल नेहरू स्वतंत्र उपनिवेश की स्थिति से संतुष्ट नजर आते थे लेकिन जवाहरलाल ने पूरी आजादी को राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। प्राइम मिनिस्टर नेहरू केरल की निर्वाचित सरकार को हटाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष श्रीमती इंदिरा गांधी की जिद ने ऐसा करना जरूरी समझा। इंदिरा गांधी की तुलना में संजय गांधी के तौर तरीके ज्यादा उग्र थे। शांत और गंभीर माने जाने वाले राजीव गांधी भी जब महासचिव बने तो आंध्र प्रदेश के चीफ मिनिस्टर को हवाई अड्डे पर सरेआम फटकार लगा बैठे। इसे लोगों ने आंध्र गौरव का अपमान माना था, जो आखिरकार तेलुगू देशम के उभार की वजह बना। इस उग्रता को सिर्फ नकारात्मक संदर्भ में न देखा जाए तो यह आशा की जा सकती है कि अगली पीढ़ी बेहतर कल की तरफ ज्यादा बेकरारी से बढ़ना चाहती है। अब राहुल इसके एक नुमाइंदे के तौर पर सामने आए हैं। सोनिया गांधी ने कहा था कि उनके या राहुल के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। लेकिन कांग्रेस में जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है उससे तो यही लगता है कि राहुल खुद वह जादू की छड़ी हैं जो यूपी और बिहार में कांग्रेस को फिर से आगे ही नहीं लाएंगे बल्कि गठबंधन की मजबूरी से भी आजाद कर देंगे। भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव अक्सर बिना किसी शोरशराबे के आते रहे हैं। फिर चाहे वह गांधी का एक अल्पज्ञात नेता के तौर पर ट्रेन के तीसरे दर्जे में सवार होकर भारत दर्शन करना हो या फिर कांशीराम का घूम घूमकर दलित सरकारी कर्मचारियों का संगठन बनाना। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई में चुनावों के जरिए पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने की कवायद को भरपूर चर्चा मिल रही है। राहुल गांधी पार्टी में अपने स्टेटस और गांधी नाम की वजह से मिले ऊंचे कद से जुड़े सवालों पर एक ही और बहुत ठोस जवाब देते हैं कि सिर्फ इसलिए कि मैं एक हायार्की, एक सिस्टम की वजह से यहां खड़ा हूं, मैं चीजों को बदलने की कोशिश न करूं, तो गलत होगा। ऐसी ही एक कोशिश है पार्टी को युवा ऊजार् और युवा कार्यकर्ता बख्शना।
देश की गरीबी के बारे उनके पिता राजीव गांधी को कम चिंता नहीं थी। उन्होंने सत्ता को दलालों से दूर रखने के साथ यह खुलासा भी किया था कि केंद्र के एक रुपये में से केवल पंद्रह पैसा ही नीचे पहुंचता है। उसका जिक्र कर राहुल गांधी अभी भी देश के गरीबों का हाल जानने की कोशिाश करते हैं। राहुल गांधी को जिस तरह उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की सराहना मिल रही है, वह भी एक सुखद आश्चर्य है। आमतौर पर हमारे नेताओं में अपने विरोधियों की प्रशंसा करने का बड़प्पन नहीं दिखाई देता। अब तो अपने विरोधियों की हरेक गतिविधि को आंख मूंदकर खारिज करना राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में अगर बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा, समाजवादी पार्टी की सांसद जयाप्रदा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राहुल गांधी के काम की तारीफ की तो यह निश्चय ही रेखांकित करने योग्य तथ्य है। शत्रुघ्न सिन्हा और जयाप्रदा ने किसी सियासी रणनीति के तहत ऐसा नहीं किया। न ही अपनी पार्टी के निर्देश पर इन्होंने ऐसा बयान दिया। इन्होंने तो अपने मन की बात खुलकर कही। इन्होंने राहुल के कामकाज का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। जयाप्रदा सपाई हैं तो शत्रुघ्न सिन्हा उस दल से हैं जिसने राहुल गांधी की गांवों की यात्राओं को ढोंग करार दिया। फिर भी शत्रुघ्न सिन्हा ने अपना विचार व्यक्त करने में संकोच नहीं किया। संघ भले ही कांग्रेस की अनेक मामलों में खिंचाई करता रहा हो पर गांवों से जुड़ने की राहुल की कोशिशों की उसने तारीफ की और सभी राजनेताओं को ग्रामीण जनजीवन से जुड़ने की सलाह दी । आरएसएस का कहना है कि अगर गांवों का विकास हुआ तो वहां से पलायन की समस्या पर रोक लग जाएगी। दरअसल राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति की जड़ता को तोड़ने की कोशिश की है। उनका संदेश है कि सियासत को एयरकंडीशंड कमरों से बाहर निकाला जाए। उसे पोलिटिकल मैनेजरों के चंगुल से मुक्त किया जाए और समाज के व्यापक वर्ग के हितों से जोड़ा जाए। दुर्भाग्य से ज्यादातर राजनीतिक दल इसे कांग्रेस का राजनीतिक हथकंडा ही मानते रहे हैं लेकिन इसे एक सबक के रूप में लिया जाए तो देश का ही भला होगा। कुछ अरसा पहले सोनिया गांधी ने कहा था कि उनका बेटा या बेटी अगर सियासत में आते हैं तो यह उनका अपना फैसला होगा। यह माना जा सकता है राहुल अपने विवेक से सियासत में सक्रिय हुए हैं। उनकी सक्रियता का ही नतीजा है कि कांग्रेस आज पूरे देश में हर जगह मजबूत हो रही है। राहुल को नेहरू-गांधी परिवार का जो प्रभामंडल मिला है उसकी एक खासियत यह भी रही है कि हर अगली पीढ़ी ने खुद को पिछली पीढ़ी से कुछ अधिक महत्वाकांक्षी, कुछ अधिक उग्र साबित किया है। मोतीलाल नेहरू स्वतंत्र उपनिवेश की स्थिति से संतुष्ट नजर आते थे लेकिन जवाहरलाल ने पूरी आजादी को राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। प्राइम मिनिस्टर नेहरू केरल की निर्वाचित सरकार को हटाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष श्रीमती इंदिरा गांधी की जिद ने ऐसा करना जरूरी समझा। इंदिरा गांधी की तुलना में संजय गांधी के तौर तरीके ज्यादा उग्र थे। शांत और गंभीर माने जाने वाले राजीव गांधी भी जब महासचिव बने तो आंध्र प्रदेश के चीफ मिनिस्टर को हवाई अड्डे पर सरेआम फटकार लगा बैठे। इसे लोगों ने आंध्र गौरव का अपमान माना था, जो आखिरकार तेलुगू देशम के उभार की वजह बना। इस उग्रता को सिर्फ नकारात्मक संदर्भ में न देखा जाए तो यह आशा की जा सकती है कि अगली पीढ़ी बेहतर कल की तरफ ज्यादा बेकरारी से बढ़ना चाहती है। अब राहुल इसके एक नुमाइंदे के तौर पर सामने आए हैं। सोनिया गांधी ने कहा था कि उनके या राहुल के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। लेकिन कांग्रेस में जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है उससे तो यही लगता है कि राहुल खुद वह जादू की छड़ी हैं जो यूपी और बिहार में कांग्रेस को फिर से आगे ही नहीं लाएंगे बल्कि गठबंधन की मजबूरी से भी आजाद कर देंगे। भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव अक्सर बिना किसी शोरशराबे के आते रहे हैं। फिर चाहे वह गांधी का एक अल्पज्ञात नेता के तौर पर ट्रेन के तीसरे दर्जे में सवार होकर भारत दर्शन करना हो या फिर कांशीराम का घूम घूमकर दलित सरकारी कर्मचारियों का संगठन बनाना। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई में चुनावों के जरिए पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने की कवायद को भरपूर चर्चा मिल रही है। राहुल गांधी पार्टी में अपने स्टेटस और गांधी नाम की वजह से मिले ऊंचे कद से जुड़े सवालों पर एक ही और बहुत ठोस जवाब देते हैं कि सिर्फ इसलिए कि मैं एक हायार्की, एक सिस्टम की वजह से यहां खड़ा हूं, मैं चीजों को बदलने की कोशिश न करूं, तो गलत होगा। ऐसी ही एक कोशिश है पार्टी को युवा ऊजार् और युवा कार्यकर्ता बख्शना।
चीनी की बेतहाशा बढ़ती कीमतें
बहुत दिनों बाद ऐसा मौका आया जब चीनी ने गुरु गुड़ को कीमतों के मामले में शिकस्त दे दी। इन दिनों खुदरा बाजार में गुड़ की कीमत ३५ रुपये है, जबकि चीनी ४६-४८ रुपये प्रति किलो बिक रही है। बहुत जल्द यह ५० रुपये प्रति किलो बिकने की तैयारी में है। चीनी के बाद दूध के मूल्य में भी उबाल आना तय है। खासतौर पर उत्तर भारत के राज्यों में। कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने दूध की उपलब्धता बढ़ाने के लिए खरीद मूल्य बढ़ाने पर विचार करने जरूरत बताई है। यह वही पवार हैं जिनके एक बयान से ही चीनी के मूल्य सातवें आसमान पर हैं। उनके ऐसे ही एक बयान से चावल के दामों में भी उछाल आया।उनके ताजा बयान से चाय की प्याली से दूध उड़न छू हो सकता है। दूध की जरूरतों को पूरा करने के मामले में अपना पल्ला झाड़ते हुए पवार ने साफ कहा, 'जब तक पशु पालकों से दूध की कीमत पर कोई फैसला नहीं हो जाता, मुझे नहीं मालूम कि विभिन्न राज्य मांग को पूरा करने के लिए दूध की खरीद कर पाएंगे या नहीं।' राज्यों के पशुपालन और डेयरी विकास मंत्रियों के सम्मेलन उन्होंने ऐलान किया कि देश को दूध की कमी का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर भारत के राज्यों में इसकी किल्लत लगातार बनी हुई है। ऐसा तब है जब देश दूध उत्पादन में दुनिया में नंबर वन है। भारत में हरित क्रांति के बाद श्वेत क्रांति हो चुकी है। जनवरी माह में बाजार में चीनी की कीमत ४२५० रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई। लोगों को अब किसी सूरत में ४६ से ४८ रुपए किलो से कम दर पर चीनी नहीं मिल सकेगी। आप अपने दफ्तर से निकल कर जिस किसी गुमटी वाले के पास चाय पीने जाएंगे, वह आप से चार से पांच रुपये प्रति कप की दर से वसूली करेगा। यह महंगाई सिर्फ गरीबों का ही नहीं बल्कि अधिकांश परिवारों का बजट गड़बड़ा रही है। उन्हें चीनी की खपत के बारे में नई रणनीति तैयार करने को विवश कर रही है। चाय कम पी जाए या फिर गुड़ की चाय पी जाए। मगर हमारे केंद्रीय कृषि, उपभोक्ता, खाद्य और जन वितरण मंत्री शरद पवार इससे परेशान नजर नहीं आ रहे। यूपीए की दुबारा बनी सरकार में वे अपने मंत्रालय पर पिछले टर्म के मुकाबले अधिक ध्यान दे रहे हैं और तब यह हाल है। पिछले टर्म में उनका अधिकांश समय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की समस्याओं को निबटाने में बीतता था। शरद पवार का गृह राज्य महाराष्ट्र देश में चीनी के उत्पादन में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे पायदान पर माना जाता है। वहां की शुगर लाबी से उनकी नजदीकियों के चर्चे अक्सर होते रहे हैं। पिछले दशक तक इस राज्य में कोआपरेटिव शुगर मिलों का एकाधिपत्य था। मौजूदा दशक में राज्य में कई प्राइवेट शुगर मिलें अस्तित्व में आईं और चीनी के उत्पादन में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी निभाने लगीं। इसे संयोग नहीं माना जाना चाहिए कि अधिकांश बड़ी प्राइवेट शुगर मिलें कांग्रेस और राकांपा के शीर्ष नेताओं के संबंधियों के स्वामित्व वाली हैं। उदाहरण के तौर पर लातूर की मांजरा चीनी मिल पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव के स्वामित्व में चीनी उत्पादित करती है। श्रीगोंडा स्थित साईंकृपा शक्कर कारखाना राज्य के आदिवासी कल्याण मंत्री बावनराव पचपुते के स्वामित्व वाला है। प्रतिदिन ४५०० टन गन्ने की चीनी बनाने की क्षमता वाले बारामती एग्रो और ३५०० टन गन्ने की खपत वाली दौंड शुगर लिमिटेड राजेंद्र पवार और अजीत पवार की है। दोनों शरद पवार के भतीजे हैं। ऐसे में पहले गन्ना किसानों के खिलाफ नीति तैयार करना और फिर एकाएक चीनी की कीमतों में भारी उछाल के लिए न सिर्फ शरद पवार बल्कि कांग्रेस नेतृत्व को भी जवाबदेह होना पड़ेगा। कहीं यह शुगर मिल को फायदा पहुंचाने के लिए तो नहीं हो रहा। बहरहाल पहले राज्य सरकारों और अब चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता में कमी को मूल्य वृद्धि के लिए जवाबदेह ठहराने वाले शरद पवार ने चीनी के आयात का फैसला कर लिया है। इससे कितना डैमेज कंट्रोल होगा यह आने वाले समय में देखा जाएगा। बहुत पहले जब देश में चीनी मिलें कम थीं और गुड़ उत्पादित करने वाली भट्ठियां अधिक तब चीनी की कीमत अधिक हुआ करती थीं। तब सस्ता गुड़ गरीबों का आहार माना जाता था। हाल के पंद्रह-बीस वर्षों में गुड़ की भट्ठियां कम होती गईं और चीनी मिलें छा गईं, लिहाजा चीनी सस्ती और गुड़ महंगा हो गया। मगर पिछले साल आखिरी महीनों में चीनी ने ऐसी छलांग लगाई कि वह गुड़ से आगे निकल गया। शरद पवार की महिमा से चीनी ने अपनी हैसियत बढ़ा ली। चीनी की कीमतों में हुई इस अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी के पीछे शीतल पेय, बिस्कुट, चाकलेट जैसे उत्पादों के निर्माताओं द्वारा आनन फानन में की जा रही खरीद भी प्रमुख वजह है। ये कंपनियां इस खबर के कारण पैनिक में थीं कि चीनी की कीमतें ५० रुपये के पार जा सकती है। सरकार ने इस पैनिक पर रोक लगाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। अगर सरकार इस मसले पर गंभीर होती तो सबसे पहले मिलों में उत्पादित चीनी के मूल्य और उसके वितरण पर लगाम लगाती। वह वेवरेज कंपनियों की खरीद का कोटा तय करती और चीनी के राशनिंग की व्यवस्था कराती लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया।
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